दुनिया की आबोहवा में जहर बहुत है,
चलो अब मुठ्ठी भर ताजी हवा चुन लें!!
मजहब तो नफ़रत बांटता है आजकल,
चलो अब कोई नया खुदा चुन लें!!
काम जिनका है कातिलों का "साथी",
चलो अब रास्ता उनसे जुदा चुन लें!!
दुनिया की आबोहवा में जहर बहुत है,
चलो अब मुठ्ठी भर ताजी हवा चुन लें!!
मजहब तो नफ़रत बांटता है आजकल,
चलो अब कोई नया खुदा चुन लें!!
काम जिनका है कातिलों का "साथी",
चलो अब रास्ता उनसे जुदा चुन लें!!
जिंदगी में जख्मों का हिसाब मत रख।
गम के पन्ने हो, वैसी किताब मत रख।।
बच्चों की तरह जीता चल जिंदगी।
चेहरे पे कोई भी नकाब मत रख।।
जिससे है शिकवा तो बता दे उसको।
दिल में छुपा के आफताब मत रख।।
यूपी के बौराल होली
(अरुण साथी)
यूपी वाला पे फगुआ के
चढ़लो ऐसन उमंग,
दबा दबा के ईवीएम के
कैलक खूब हुड़दंग
जोगीरा सारा रा रा...
मोदी जी भी पी
लेलका जैसे भंग,
बोल-कुबोल से छोड़ा
देलका यूपी के जंग
जोगीरा सारा रा रा...
सोंच रहल हे बबुआ
बाबू-चाचा से कैलक काहे जंग
चिंता में डूबल डिम्पल भौजी
केकरा डाले रंग
जोगीरा सारा रा रा...
रो रहल हे राहुल बाबा
मम्मी जी के संग
बहिन जी के ब्लड प्रेशर बढ़ गेल
केजरी कहलक "जनता है मन-मतंग"
जोगीरा सारा रा रा...
(अरुण साथी)
आंय जी,
प्रेम विवाह के
दो दशक हुए आपने मुझे
कभी वेलेंटाइन विश नहीं किया..!
मैंने कहा, बंदरी
आजकल के लौंडे
कई को विश करते है।
एक को कॉल तो
दूसरी को मिस करते है।
तीसरी से व्हाट्सअप
तो चौथी से फेसबुक पे
चैटिंग है,
नए दौर के मजनुओं का
दर्जनों से सेटिंग है..
मेरे जैसा प्रेम करके
पत्नीव्रता होना
बकलोली है,
इसी लिए तो आपकी
इतनी बढ़ी हुई बोली है!
प्रेम प्रदर्शन नहीं
आत्माओं का मिलन है।
प्रेम ईश्वर का
प्रसाद है।
प्रेम समर्पण
और त्याग है।
बस क्या
बंदरी ने किस किया,
मुझको भी वेलेंटाइन विश किया..!
वजूद
**
तेज ताप से
खौल उठता है
वजूद...
और उधियाने
लगता है
तभी कोई अपना
पानी का छींटा देकर
संभल लेता है..
उधियाते वजूद को..
(तस्वीर को कैद करते हुए दो शब्द गढ़ दिए..)
@अरुण साथी
मौत से पहले...
बहुत भचर-भचर करते हो
मार दिए जाओगे
एक दिन
उन्हीं लोगों की तरह..
लगी होगी एक-आध गोली
पीठ में, सीने में
या कनपट्टी के आसपास कहीं..
बीच सड़क पे
बिखर जायेगा तुम्हारी रगो
का खौलता हुआ खून
और लहू का लाल रंग
काली तारकोल से मिलकर
गडमड रंग का हो जायेगा...
हाँ, कुछ लोग आएंगे
सहानुभूति जताएंगे
पर कुछ लोग वहीं
लाश के सिरहाने ही
गाली भी देंगे
कुछ बुरा,
कुछ भला कहेंगे..
क्यों और किसके लिए
यह सब करते हो...
उपरोक्त आत्मीय
वचनों के बीच के
अंतर्मन में
नाद गूँज उठा
"मौत से पहले कौन मरा है?"
"मौत आने पर कौन बचा है..?"
"अहिंसा परमो धर्मः"
कहने वाले गाँधी की
तस्वीर खादी से मिटा दी....
हंगामा क्यों है बरपा
जो उन्होंने अपनी
फितरत बता दी.….
#साथी के #बकलोल_वचन
महुआ महके तोर अंगना में,
सूरजमुखी खिल जाये।
बेला, जूही, हरसिंगार सन,
जीवन खुशबु से भर जाये।।
सरसों फूलो, मांजर महके,
धान, गेहुम लहराये।
केतारी सन रसगर हो जीवन,
मटर, मकई नियर गदराये।।
कोयल कूके, बुलबुल गाये,
तोता, मैना शोर मचाये।
आये गोरैया, पानी पिए,
अंगना में, धप्चुहिया मुस्काये।।
चुमनुमिया चिरैया शोर मचाये,
कागा आके भोर जगाये।
खिले गुलाब, गेंदा गोदी में,
कहे "साथी" बथान में गोरु-गाय डोंराय।।
*नव बर्ष की मंगलकामनाएं..*
अरुण साथी, पत्रकार, बरबीघा, (बिहार)
भागमभाग
उठापटक
कभी उधर
कभी इधर
सपने-हकीकत
घर-परिवार
दोस्ती-यारी
देश-समाज
दाल-रोटी
की जद है जिंदगी..
**
घिसे चप्पल
सिले जूते
चिप्पी पैंट
फटे जेब
फटी चादर
और लंबे पैर
की हद है जिंदगी..
**
एक चुटकी ईमानदारी
मुठ्ठी भर बेईमानी
मन भर आत्मा
छटाँक भर परमात्मा
बड़े बड़े बोल
कर्म, कुकर्म
बस यही सब
कशमकश है ज़िन्दगी...
***
सुबह सूरज उगे
कि फूल खिले
पंछी के गीत हो
कि शाम ढले
नया साल आये
कि पुराना साल जाये
आम आदमी के लिए
तो बस
जद्दोजहद है जिंदगी..
(27-12-16)

झूठ की खेती
(अरुण साथी)
वह बंजर जमीन हो
या कि हो
मरूभूमि
या हो
पठार-पर्वत
कुछ लोग
बड़े कुशल उद्यमी
होते है
और वे बंजर जमीन पे भी
झूठ की फसल बोते है
लच्छेदार बातों से
उसे सींचते
कोड़ते और निकोते है
सच कहता हूँ
कुछ लोग
झूठ की खेती करने में
बड़े मास्टर होते है..
परिवार
**
माँ-बाबु जी का
गलतियों पे डाँटना,
उदासी का कारण पूछ
दुःख बाँटना है।
अच्छा लगता है..
2
दोपहर को खाने का
मिसकॉल आना,
देर रात घर पहुँचने पे
बीबी का रूठ जाना।
अच्छा लगता है..
3
बिना वजह आप किसी से
भी क्यों उलझते है,
दुनिया की छोड़ अपनी
फ़िक्र करो; भाई का समझाना।
अच्छा लगता है...
4
बेटा का खिलौने
की जिद्द नहीं पकड़ना
टूटे जूते को देख टोकने पर,
अभी चलेगा पापा कहना।
अच्छा लगता है..
5
मुंहझौंसी, जरलाही कहके
बीबी को चिढाना,
मायके की शिकायत पे
उसका मुंह फूलना।
अच्छा लगता है..
6
बेटी की सहनशक्ति
गाहे-बेगाहे सामने आना,
अभावों को छुपा कर
उसका मुस्कुराना।।
अच्छा लगता है...
दासी लोकतंत्र
**
साथी उवाच
"क्यों
जनतंत्र में
मालिक जनता
भूखी और प्यासी है?
राजा के घर क्रंदन
क्यों है?
क्यों मुख पे
छाई उदासी है?"
**
बकलोल उवाच
"क्योंकि
लोकतंत्र तो
वंशवादी,
जातिवादी,
धर्मवादी,
नेताओं के
चरणों की दासी है।।।
(शपथ ग्रहण के बाद उत्तरप्रदेश के मुखिया मुलायम सिंह के पैरों में लटके मंत्री गायत्री प्रजापति प्रसंग पे)
भूख और माँ
(सोशल मीडिया पे वायरल इस तस्वीर को देखकर साथी के शब्द.. निःशब्द..)
**
जिंदगी है
मौत है
और है
मौत से भी
भयावह
क्रूर
बर्बर
भूख..
इसीलिए तो
भूख और माँ
की लड़ाई में
भूख जीत जाता है
माँ हार जाती है..
अक्सर..
"भक्त"
**
"अच्छे दिन"
और
"काला धन"
को जुमला
कहे जाने पर भी
जो आसक्त रहते है,
हे तात
कली काल में
उसे ही
भक्त कहते है..
----
#साथी के #बकलोल वचन
यह एक प्रहसन है
लोकतंत्र का प्रहसन
यहाँ
लिखी गयी पटकथा पे
अभिनय करते है
लोग
तभी तो
वही लोग
जो कल तक
रावण को मानते थे
राक्षस,
आज अचानक
भगवान् मानने लगे..!
वही लोग
जिनके लिए पाप था
सीता का
अपहरण
द्रोपदी का
चीरहरण
लाक्षागृह दहन
दुर्योधन का
अत्याचार,
आज इसे ईश्वर की
इच्छा मानने लगे..
वही कृष्ण
जाने कैसे
कुरुक्षेत्र में
आकर
कहने लगे
"हे तात
लाभ-हानि
जीवन-मरण
यश-अपयश
सब कुछ विधि हाथ..
जिंदगी अब कहाँ किसी
सिरहाने टिकती है।
हर एक रिश्तों की अब
धुंधली सी तस्वीर दिखती है।।
◆कोई होकर भी अपना,
कभी अपना न हुआ।
किसी की जिंदगी गैरों
की खातिर ही बिकती है।।
◆जाने क्या रिश्ता है
अपना उनसे।
वो पगली मुझे देख कर
बेवजह हंसती है।।
◆देखा है अलग अलग
चेहरे रिश्तों के यहाँ,
सुना है रिश्ते भी अब
ब्यूटी पार्लरों में सजती है।।
आईये यूँ छिछियैनी दुर्गन्ध
(अरुण साथी)
बोन चाइना की
कशीदाकारी प्लेट में
जब गोश्त का टुकड़ा डाला
तो अजीब सी छिछियैनी
दुर्गन्ध आई...
पांच सितारा भव्यता
लेज़र लाइटिंग की चकाचौंध
ह्रदय गति को
स्तंभित करती
डीजे की धूम-धड़ाक में भी
यह छिछियैनी सी दुर्गन्ध
जानी पहचानी सी लगी..
ओह,
यह तो वही छिछियैनी सी दुर्गन्ध है
जो आज ही अस्पताल में पड़ी
दहेज़ के लिए जली
एक बेटी की
देह से आ रही थी..
ओह, ओह, ओह
नहीं
अभी हारा नहीं हूँ मैं..
गिरा भर हूँ
मुँह के बल ही सही
गिर जाना
हारना नहीं होता..
फिर उठ कर चलूँगा
एक एक कदम ही सही
मंजिल की ओर
जीतने के लिए
और
जबतक
जीतने का जुनून बाकि है
हारा हुआ मत समझना मुझे
सुना की नहीं
सुन तो लो सही
हारा हुआ मत समझना..
मैं जागो मांझी बोल रहा हूँ, हाँ मैं भूख से नहीं मरा..
(अरुण साथी)
हाँ मैं जागो मांझी ही बोल रहा हूँ
गलत है कि मैं मर गया हूँ
मैं मर कैसे सकता हूँ
मैं तो बोल ही रहा हूँ
कि मैं भूखा हूँ
मुझे रोटी दो
पर सुनेगा कौन?
इस कब्रिस्तान में?
समूचा शहर ये कब्रिस्तान है
जिसमे रहते है साँस लेते
चलते, बोलते लोग
और इसी कब्रिस्तान का राजा
को मेरे भूखे होने की आवाज
नागवार लगी है
इसी लिए उन्होंने
मेरे शारीर को
चिड़फाड़ कर
यह साबित किया
कि मैं भूखा नहीं हूँ
हे महाराज
मैं अकेला नहीं
बोल रहा हूँ
लाखों है बोलने वाले
कि मुझको ही मेरे हिस्से का
राशन नहीं मिलता,
हे महाराज
मेरे जैसों की क्रंदन को
सुनो तो,
और सुनो तो
कि मरने के बाद भी
जागो मांझी क्या बोल रहा है..
हाँ मैं भूख से नहीं मरा,
मैं तो मरा हूँ
इस व्यवस्था कि
अकर्मण्यता से
निर्लज्जता से
संवेदनहीनता से
मैं तो मरा हूँ
छीन लिए गए
मेरे हिस्से के
उन
निवाले कि वजह से
जो
नोटों की शक्ल में
तुम्हरी तिजोरी में बंद है
सुनो तो सही
मैं जागो मांझी बोल रहा हूँ...
(भूख से मरे जागो मांझी की खबर करने के बाद)
उल्टी करता आदमी..
पता नहीं क्यों
दूसरों की वनिस्पत
कुछ आदमी में बड़ी कमी होती?
दूसरे
हजम कर जाते है
बहुत कुछ
कई तो सबकुछ
जैसे वो
आदमी नहीं
तिलचट्टा हो
सर्वाहारी...
कुछ
उल्टी कर देते हैं
हज़म नहीं कर सकते
सबकुछ
जैसे कि
सामाजिक बिसंगति
धार्मिक थोथापन
जातिय उन्माद
और कर देते है उल्टी
कहीं किसी समाज में
कहीं किसी देश में
कहीं किसी सोशल मीडिया में...
सच है
उल्टी करने वालों को भला
कौन पसंद करेगा
फिर भी
कुछ लोग है उल्टी
करनेवाले
तभी बची है दुनिया..