शनिवार, 6 फ़रवरी 2016

रोज डे पे साथी के बकलोल वचन

रोज डे पे साथी के बकलोल वचन
(अरुण साथी)
🌹🌹🌹
रोज डे पे श्रीमती जी को
जब गुलाब दिया
तो उसके चेहरे पे
प्रेम का भाव नहीं पाया,
मैं अत्यधिक घबराया,
मन में संशय आया,
कहीं किसी ने
मुझसे पहले तो
गुलाब नहीं थमाया!
🌹🌹🌹
पूछा,
"प्रिय, अपनी शादी के
सिल्वर जुबली बर्ष पे भी
मैंने तुम्हें ही गुलाब थमाया,
फिर तुमने
मेरे रगो के खौलते लहू में
अपनी शीतलता का
भाव क्यों मिलाया?"
😡😡😡
श्रीमती जी और भड़क गयी,
"कलमुहें,
क्या मैं तुम्हें
जानती नहीं?

जरूर यह गुलाब किसी
कलमुंही के लिए ख़रीदा होगा,
मेरे लिए तो आज तक
एक बिंदी भी नहीं लाया....!

जानता नहीं कि
बासी कढ़ी में उबाल नहीं आता।

तुम गधे मर्द तो
सुहागरात के अंधे होते हो,
तुम्हें हमेशा दूसरी
तरफ की सूखी घांस भी
हरी हरी
नजर है आती है,
दूसरी वाली जरलाही भी
मन को भाती है,
अपनी बीबी तो
हर बात पे काट खाती है..।

मैं तो अवाक रह
सोचने लगा,
बीबी और मोदी जी में
कितनी समानता है,
एक "मन की बात" करते है,
एक "मन की बात" पकड़ती है..।
मोदी भी अकड़ते है,
बीबी भी अकड़ती है...।।।

शुक्रवार, 5 फ़रवरी 2016

पहली सी मोहब्बत नहीं रही....



























उनको अब मुझसे शिकायत नहीं है,
शायद अब पहली सी मोहब्बत नहीं रही।

दुश्मनों से भी हंस-बोल लिया करते थे,
शायद अब पहली सी अदावत नहीं रही।

इन्कारे-ए-मोहब्बत पर तेजाब फेंक देते हैं,
शायद अब पहली सी इश्के-रवायत नहीं रही।







रविवार, 31 जनवरी 2016

ब्रह्मपुत्र













स्वर्ण देश का
प्रजापालक था वह..


स्वर्ग में सीढ़ी लगाने,
समुन्द्र जल मीठा करने का
राष्ट्रवादी स्वप्नद्रष्टा था वह..


वह प्रकांड ब्राह्मण
और ब्रह्मपुत्र था...


वह भक्त था,
महाभक्त,
महाकाल का..


सर्वगुण सम्पन्न था वह..

बस,
वह अहंकारी था
और
रावण कहलाया..!

गुरुवार, 21 जनवरी 2016

बिहार में बहार हो!!

#साथी के #बकलोल_वचन कड़ी में  मगही कविता के माध्यम से बिहार के दर्द के आवाज देलियो हें।

बिहार में बहार हो!!

बिहार में आईलो ई कईसन बहार हो?
जन्ने देखहो ओन्ने गोलिये के बौछार हो!!
हत्या, लूट, रंगदारी तो जेनरल बात हो,
अपहरण के चकाचक चललो रोजगार हो!!
बिहार में आईलो ई कईसन बहार हो?
व्यपारी, दरोगा औ इंजीनियर के मारे गोली!
अदमि के जान जैसे गजरा-मुराय हो..!!
बिहार में आईलो ई कईसन बहार हो?
रोड रॉबरी, घर में डाका औ होबो हो छिनतई,
बैंक डकैती तो जैसे पर डे के कारोबार हो!
बिहार में आईलो ई कईसन बहार हो?
छोटका भाय; कुर्सी पाय, खूब नितराय!
बड़का भाय; सपरिवार, सिरोरे मलाय हो!!
बिहार में आईलो ई कईसन बहार हो?

सोमवार, 18 जनवरी 2016

साथी के बकलोल वचन (जंगलराज आयो)

कुख्यात पति मंडल को
एमएलए पत्नी भारती
ने थाने से छुड़ायो,
😡😡😜
थानेदार को
कान के नीचे दो बजायो,
👋🏿👋🏿👋🏿
फिर समझायो,
🐶🐶🐶
पता नहीं तोको,
बिहार में जंगलराज आयो..
🐯🐯🐯
#साथी के #बकलोल_वचन

मंगलवार, 10 नवंबर 2015

अप्प दीपो भवः
























अप्प दीपो भवः
**
दीया हमें बताता है।
जलना हमें सिखाता।।
**
छाये जब घंधोर अँधेरा,
दीया नहीं घबराता है।।
**
पहले जलता एक दीया,
फिर असंख्य बन जाता।।
**
जलता है जब एक दीया,
तब अंधकार मिटाता है।।
**
दीपावली की हार्दिक शुभकामनायें....

बुधवार, 9 सितंबर 2015

एक निराशावादी कविता


















समुन्द्र किनारे
तूफानी तरंगों से
बचते-बचाते
बनाया जिसे
उस घरौंदे को

जाने क्यूँ
मिटा देने का 
मन करता है...

बचपन
जवानी
जीवन 
और
रेत का घरौंदा

गुरुवार, 3 सितंबर 2015

फगुनिया

फगुनिया
***
रे फगुनिया
सुन रही है रे तू
ठन ठन, ठनाक
यह छेनी
हथौड़ी
की आवाज़ नहीं है रेयह प्रेमी की
हाँक है
हनक है
सनक है


सुन रे फगुनिया
यह तुझे
स्वर्ग में भी सुनाई देगी
रे फगुनिया
प्रेम की ताकत है यह रे
पहाड़ का छाती तोड़ दिया इसने
और हमेशा की ही तरह
चूर चूर कर दिया
अहँकार का सीना...
रे फगुनिया
देख तो
यह शहंशाह का
ताजमहल नहीं है रे
यह गरीब का प्रेम है
निर्मल प्रेम
गहलौर घाटी के हर पत्थर पे
तेरा नाम गुदा है रे
रे फगुनिया..
सुन रही है रे
सुन तो

(बिहार के गया के गहलौर में दशरथ मांझी के द्वारा पत्नी के निधन के बाद बाईस सालों तक तक पहाड़ तोड़ कर रास्ता बना दिए जाने के बाद कुछ शब्द ...)

रविवार, 23 अगस्त 2015

एक सवाल















एक सवाल 
**
सवाल यह नहीं है
कि हम अपनों के लिए 
क्यूँ करते है
कर्म-कुकर्म 
पुण्य-पाप..?

**
सवाल तो यह भी नहीं है 
कि हम अपनों के लिए 
जीते क्यूँ है..?

**
सवाल तो यह है 
कि हमारा अपना है कौन....?

गुरुवार, 16 जुलाई 2015

अपनी लाश को ढोना...



















(अपनी वेदना को शब्द दी है, बस...)

पहाड़ सी जिंदगी 
का बोझ पीड़ादायी होता है..

उससे अधिक
पीड़ादायी हो जाता है
किसी अपने का 
पहाड़ सा 
दिया हुआ दुख....

और जब
आदमी 
अपनी ही लाश को
ढोते हुए जीने लगता है,
तब
उस असाह्य
पीड़ा के प्रति भी
वह संवेदनहीन सा हो जाता है!

जाने क्यूं...?


(चित्र- गूगल  देवता से उधार लिया हुआ)

सोमवार, 6 जुलाई 2015

निराश मत हो...

शनै: शनै:
अस्ताचल की ओर
जाते सूरज को देख
बहुत आशान्वित हो जाता हूं,
जैसे 
उर्जा की एक नई किरण
समाहित हो अन्तः को
जागृत कर रही हो....
.........
जैसे 
कह रही हो,
फिर होगी सुबह,
फिर निकलेगा सूरज,
नई उर्जा,
नई आशा,
नया दिन और
नई चुनौतियों के साथ,

निराश मत हो...


(तस्वीर- मेरे गांव में डूबते सूरज की)

शुक्रवार, 10 अप्रैल 2015

"साथी" ने अर्ज़ किया है..

थोड़ी संजीदगी, थोड़ा एहसास दे दे ।
ऐ मोहब्बत, उनको भी मेरी प्यास दे दे ।।
***
उनकी बेवफाई का कहीं शिकवा न करूँ ।
अपनी मोहब्बत को कहीं रुस्बा न करूँ ।।
ऐसी इल्म कोई खास दे दे ।।
ऐ मोहब्बत, उनको भी मेरी प्यास दे दे ।।
***
शकून से ही जिंदगी गुजर नहीं होती ।
गम के बगैर जिंदगी मुख़्तसर नहीं होती ।।
मेरे महबूब को ये थोड़ी सी जज्बात दे दे ।
ऐ मोहब्बत, उनको भी मेरी प्यास दे दे ।।
***
जिस्म तो बाजारू है, सिक्कों पे बिका करती है ।
हुश्न का टूटता गरूर कोठो पे दिखा करती है ।।
मेरी सदा रूह तक पहुंचे, ऐसी कोई हालात दे दे ।
ऐ मोहब्बत, उनको भी मेरी प्यास दे दे ।।
***

सोमवार, 30 मार्च 2015

गांव और मैट्रो की जिन्दगी...

गांव और मैट्रो की जिन्दगी में 
थोड़ी सा फर्क होता है
बेमौसम बारिस 
और ओला गिरने पर
सोशल मीडिया पे
मैट्रोवासी 
और
एफएम पे आरजे
चुहल करते हुए
खुशनुमा मौसम के 
कसीदे गढ़ते हैं.....

पर गांव में
बर्बाद हुए खेत को देख
किसान
आत्महत्या करते हैं.....!!




















(एफएम रेडियो पर अभी अभी आरजे की चुहल को देखते हुए यह मेरी संवेदना के शब्द है, यदि किसी आरजे तक मेरी संवेदना पहूंचे तो प्लीज इसे प्रसारित करने का साहस करेगें....यह किसान का दर्द है जिसके खून पसीने की रोटी आप भी खाते है.....अरूण साथी, बरबीघा, बिहार...और शेयर करने वालों मित्रों से अनुरोध होगा कि साभार में मेरा नाम देने का कष्ट करें....)

रविवार, 22 मार्च 2015

"साथी" के बकलोल वचन / (बिहार के हालात पे मगही कविता)

बुढ़िया के बृद्धापेंशन ले दौराबो हा ।
जुअनका के रोजगार ले परदेश भगाबो हा ।।
कैसन बिहार दिवस मनाबो हा...
***
गरिबका के रहे ले झोपड़ियो नै है ।
अमिरके के इंदिरा आवास बनाबो हा ।।
कैसन बिहार दिवस मनाबो हा...
***
गाँव-गाँव, गली-गली सरकारी दारू बेचबाबो हा ।
अनपढ़बा के नकली सर्टिफिकेट पे मास्टर बनाबो हा ।।
कैसन बिहार दिवस मनाबो हा..
***
गरिबका के मिलो है नै पिये खातिर पानी,
बाबू साहेब के घर विधायक जी चापाकल गड़बाबो हा ।।
कैसन बिहार दिवस मनाबो हा...
***
गरीब के मिले बाला अनाज खा जाहो डीलर,
अफसर औ लीडर भी अपना हिस्सा बनाबो हा ।।
कैसन बिहार दिवस मनाबो हा...
***
थाना में दरोगा जी दे हथुन गाली,
एसपी तर जाहो त पैसा फरियाबो हा ।।
कैसन बिहार दिवस मनाबो हा...
***
नै खाद, नै बीज नै मिलो है किसान के डीजल अनुदान ।
इहे पैसा से पंचायत सेवक औ मुखिया महल बनाबो हा ।।
कैसन बिहार दिवस मनाबो हा..

गुरुवार, 19 मार्च 2015

बसंत.....




बसंत

***
झड़ झड़
पतझड़
हमें बताता है,
जीवन सुख
और दुःख है
हमें सिखाता है...

आज है
पतझड़ तो
कल बसंत आएगा,
झड़ झड़
झड़ते पत्ते
यही जताता है....

(तस्वीर और कविता दोनों साथी की)

बुधवार, 4 मार्च 2015

जोगीरा सा रा रा रा / बुरा मानो होली है

मोदी बनिया बड़ी सियाना, नोन-भात नै खाय।
आडानी के गले लगाबे, किसान पेट पकड़ डिरराय...।।
जोगीरा सा रा रा रा.. जोगीरा सा रा रा रा..
***
रे अरविन्दबा, रे जरलहबा, तोहूं लेगें उमताय।
सभ्भे नियर बुढ़-बुजुर्ग के घर से देले भगाय..।।
जोगीरा सा रा रा रा.. जोगीरा सा रा रा रा..
***
नीतीश भैया सुशासन के तोहूं देला भुलाय।
मोदी मोदी करो ह खाली, तोहूं गेला ललुआय....।।
जोगीरा सा रा रा रा.. जोगीरा सा रा रा रा..
***
राहुल बउआ, बउआ, सब मिल रहे मनाय।
पीएम कुर्सी लाकर दे दो, बउआ भागल जाय..।।
जोगीरा सा रा रा रा.. जोगीरा सा रा रा रा....




शनिवार, 21 फ़रवरी 2015

समाजवाद का अंतिम निष्कर्ष..


















लोहिया और जेपी की
विचारधारा का
उत्कर्ष देखिये

***
सेफई में दम तोड़ते
समाजवाद का
अंतिम संघर्ष देखिये..
***

गरीब गुरबों के
नेताजी को
सामंतवादी
कायाकल्प होते
सहर्ष देखिये...
***
चले थे जो बनके
दबे कुचलों
की आवाज़
उनकी नंगई
और
उनका
विमर्श देखिये...
***
कब्र तो खुद रहा था
कब से
दफन हो चुके
समाजवाद
का अंतिम
निष्कर्ष देखिये...
***

शनिवार, 14 फ़रवरी 2015

बेलनटाइन डे पर ‘‘साथी’’ का दर्द (मगही हास्य कविता )

(अरूण साथी)


बेलनटाइन डे पर 
हम्मर कन्याय रूठल हो
नोन, तेल, हरदी खातिर
घर में तोप छूटल हो.....

कहलको, जरलहवा के 
मन कत्ते रंगीन हो
औ जेभी में नै
कौड़ी तीन हो...
ऐक्करा से
वियाह करके
हम्मर तो करमे फूटल हो...
बेलनटाइन डे पर 
हम्मर कन्याय रूठल हो


औ एगो दोस्त
हमरा सताबो हो
फेसबुक के कई गो
महिला मित्र 
ओकरा अपन
वैलेंटाइन बताबो हो
ईहो कलमूंहा
बड़की घूटल हो...
बेलनटाइन डे पर 
हम्मर कन्याय रूठल हो..





मंगलवार, 27 जनवरी 2015

दर्दनाक मौत

ओबामा है
बुलेट रेल है
स्मार्ट सीटी है
परमाणु उर्जा है
गंगा सफाई है
सड़क सफाई है
उधोग है
उधोगपति है
बहुत कुछ है
इस चकाचौंध में
बस नहीं है तो
एक अदद
रोटी नहीं है...
और नहीं है तो
गरीब की मौत
पे कोई मातम नहीं है...

(मां और उसके तीन बच्चों के दर्दनाक आत्महत्या पे साथी के दर्द)

शुक्रवार, 28 नवंबर 2014

गिरगिट













अपने बेटे को
गिरगिटाधिराज की
उपाधी दिए जाने पर
पिता ने कहा...
मेरा बिटुआ भी
पुरखों का नाम
रौशन करने लगा है...

अब यह भी
नेताओं की तरह
रंग बदलने लगा है

सोमवार, 10 नवंबर 2014

आदमी श्रेष्ठ या गदहा ..
















आदमी को गदहा कहे जाने का
गदहा संध के अध्यक्ष ने
कड़ विरोध जताया है
कहा..

"आदमी ने धर्म-जाति
के नाम पर
भाई को लड़ाया है

राम और रहीम के नाम पर
रक्त बहाया है

हमने पीठ पर पत्थर ढोकर
कमाया और खाया है

इस तरह
चाल, चरित्र और चेहरा
देखकर हमने
खुद को आदमी से बेहतर पाया है....."






शनिवार, 8 नवंबर 2014

बेवफाई

शाम ढलते ही याद आती है वो।
बिछड़ के भी कितना सताती है वो।।
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वो भी एक दौर था, हर शाम उनके नाम थी।
आज भी यूं शाम अपने नाम करवाती है वो।।
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चाहत को न पाने का मलाल आज भी है मुझे।
मेरी इस चाहत पे गुरूर क्यूं न कर पाती है वो।।
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वो बेवफा नहीं है, इतना तो एतवार है मुझको।
फिर सरे महफिल बेवफाई क्यूं जताती है वो।।
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शुक्रवार, 31 अक्टूबर 2014

धुंआ उठता है..



आंसू मेरे बहे 
भींगे उनके नयन
दर्द मुझकों मिला 
सजी उनकी गजल

न चिंगारी उठी
न आग लगी
फिर भी
जलन है
तपन है
और धुंआ भी उठता है

देखिए
बड़ी नफाशत से
साथी के जिंदगी का
शहर जलता है......

मंगलवार, 21 अक्टूबर 2014

साथी के बकलोल वचन


कुछ
श्रमजीवी मीडिया मजदूर
धन-तरस कहलाते है

इसलिए
धनतेरस पे
खाली हाथ  घर जाते है
बीबी की डांट खाते है
और
बेचारे दांत ही दिखाते है

कल से फिर
छाती तान
काम पे लग जाते है..

(श्रमजीवी को समर्पित । बेशर्म जीवी के तो जत्ते कह्भो ओत्ते कम पडतो..)











Arun sathi

बुधवार, 24 सितंबर 2014

देवी दुर्गा

घर से लेकर बाहर तक, नारी का करते नहीं सम्मान।
फिर दुर्गा पाठ और मूर्ति पूजा का क्यूँ धरते हैं स्वांग।।

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मरती है बेटी कोख में, लुट जाती उसकी अस्मत।
दहेज़ से लेकर कामुकता से करते हैं देवी का अपमान।।


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करते है देवी का अपमान, कि हम है घोर अघोरी।
प्राणवान की पूजा नहीं और मूरत में ढूंढे प्राण।।