मंगलवार, 25 फ़रवरी 2014

इश्कतारी है.....


जबसे साथी पे इश्कतारी है।
हर पल उनकी खुमारी है।।

आँखों में फुल सा चेहरा।
दिल में खिली फुलबाड़ी है।।

होठों पे है हंसी हरदम।
ये कैसी लगी बीमारी है।।

जुस्तजू सी है हर सू उनका।
फिर भी मिलन में दुश्वारी है।।

हर शय में अक्स उनका है।
इश्क की ये कैसी बेकरारी है।।




(मेरे द्वारा खिची गयी एक बंजारन की तस्वीर) 

बुधवार, 19 फ़रवरी 2014

अब कहां अंधेरों से डर लगता है?

अब कहां अंधेरों से डर लगता है?
साथ रहा इतना, की घर लगता है।।

तेरी जुल्फों की छांव बहुत है शकून के लिए।
बिछड़ा तो, फिरूंगा दर-व-दर लगता है।।

अमावश की रात, मिले थे हम-तुम अचानक।
उस रात की न होती सुबह, हर पहर लगता है।।

छुपा लेता है आगोश में अंधेरा, भला-बुरा सब।
इसपे भी है मोहब्बत का असर लगता है।।

शुक्रवार, 7 फ़रवरी 2014

रोज डे पे बीबी को गुलाब जो दिया...

रोज डे पे बीबी को गुलाब जो दिया।
मुफ्त का ही आफत मोल ले लिया।।

बोली

इतने सालो तक तो दिया नहीं, वह हड़क गई।
लाल गुलाब को देख सांढ़िन की तरह भड़क गई।।

जरूर किसी कलमुंही की नजर लगी है आपको।
तभी यह सब फितुर सूझा है मुन्ना के बाप को।।



मैंने कहा
डार्लिंग, अब जमाना हाई-फाई हो रहा है।
पुराना सामान अब बाय बाय हो रहा है।।

अब तो लोग रोज डे पर प्रेम का प्रदर्शन कर रहे है।
पत्नी को छोड़ फेसबुक, ट्युटर पे कईयों पर मर रहे है।

वैसे में मैं यह रोज लेकर जब आया।
फिर भी तुमको यह क्यों नहीं भाया।।

बोली
प्यार को गुलाबों से तौल कर बताते नहीं है।
जाओ जी, जताते वहीं जो निभाते नहीं है।







बुधवार, 5 फ़रवरी 2014

घड़ियाली आंसू भी आंखों में यार होना चाहिए.....

घड़ियाली आंसू भी आंखों में यार होना चाहिए।
इस दौर में आदमी को दुनियादार होना चाहिए..

हों कहीं भी, खुश रहे हमदम अपना।
चाहने वालों के दिलों में ऐसा प्यार होना चाहिए।।

मिलने-जुलने का शायद यह भी एक बहाना हो।
मशरूफ जिन्दगी में कुछ न कुछ उधार होना चाहिए।।

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क्यों कोई साथी इतना मशहूर हो जाए।
कि वह अपनों से दूर हो जाए।।
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न शिकवा है,  मुझसे शिकायत भी नहीं है।
शायद उनको मुझसे मोहब्बत ही नहीं है।।
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ता उम्र करता रहा तेरे आने का इंतजार।
मेरी मैयत पे भी न आओगी, सोंचा नहीं था।।
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शनिवार, 1 फ़रवरी 2014

वह मुझकों भी काफिर कहने लगा है..

अब कोई क्यों मुझसे खफा हो।
मैं खुद से ही खफा रहने लगा हूं।।

गैरों से अब शिकवा कैसा।
अपनों का तंज सहने लगा हूं।।

चापलूसों के दौर में सच बोल न दूं कहीं।
इसलिए मैं अक्सर चुप रहने लगा हूं।।

कहता हूं गर मोहब्बत ही है खुदा का मजहब।
वह मुझकों भी काफिर कहने लगा है।।

गुरुवार, 16 जनवरी 2014

नाप देता है आदमी



नाप देता है आदमी
जरा सा हंस-बोल 
क्या लिया
नाप देता है आदमी
औरत का पूरा देह
वामन की तरह...

औरत की देह
की चौहद्दी
उसकी गोलाई
से लेकर
चौड़ाई तक
सब कुछ
एक नजर में...

नहीं नाप पाता है
आदमी
ताउम्र
औरत की गहराई...

रविवार, 12 जनवरी 2014

मेंहदीं का सुर्ख रंग...और बिखरे छींटे,,,

वे दिलों से खेलने में बड़ी हुनरमंद,
टूटे दिलों से खेलकर भी मजा लेते है।

उनकी मेंहदीं का रंग सुर्ख यूं ही नहीं,
दिल के लहू को वह हथेली पे सजा लेते है।।

क्यूँ कोई साथी इतना मशहूर हो जाये।
कि वह अपनों से दूर हो जाये।
फिसलन और ठोकर भरी राहों पे तो सभी संभलकर चलते है।
तुम सीधी.सपाट राहों पे संभलकर चलना साथी।।

(एक्सप्रेस हायवे जादे खतरनाक होबो हैय भाय जी)
4
क्यूँ हर शख्स की गलतियाँ गिनाते हो साथी।
जहाँ में आदमी बसते हैए पैगम्बर नहीं बसते।
5
क्यूँ किसी को साथी तुम इतना है भाता।
तुम्हे तो बाजीगरी का हुनर भी नहीं आता।।
6
यूँ ही रूठ कर महफ़िल से चली जाती हो। 
कहो तो अब शिकवा किससे करें।।
एक तुम्ही हो जो मुझसे मोहब्बत कर बैठे।
कहो तो अब रुसवा किसको करे।।
7
अपनी वेवफाई का गिला कैसे करूँ
फिर से मोहब्बत का सिलसिला कैसे करूँ
खोकर भी तुमको पाने की आरजू जिन्दा है अभी
तुम्ही कहो की आज भी यह हौसला कैसे करूँ.

गुरुवार, 9 जनवरी 2014

देह बेच देती तो कितना कमाती...

(यह पुरानी रचना मैंने झाझा के आदिवासी ईलाके में कई दिन बिताने के बाद लिखी थी आपके लिए हाजिर है।)
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रोज निकलती है यहां जिन्दगी
पहाड़ों की ओट से,
चुपके से आकर भूख 
फिर से दे जाती है दस्तक,
डंगरा-डंगरी को खदेड़
जंगल में,
सोंचती है
पेट की बात।

ककटा लेकर हाथ में जाती है जंगल,
दोपहर तक काटती है भूख
दातुन की शक्ल में..

माथे पर जे जाती है शहर
मीलों पैदल चलकर
बेचने दतमन
और खरीदने को पहूंच जाते है लोग
उसकी देह..................

वमुश्किल बचा कर देह
कमाई बीस रूपये
लौटती है गांव
सोचती हुई कि अगर

देह बेच देती
तो कितना कमाती...............


(चित्र गूगल से साभार )

मंगलवार, 24 दिसंबर 2013

सोंचा न था

वाकिफ तो था तुम्हारी फितरत से।
वेबजह वेवफा होगे, सोंचा न था।।

ऐतवार न था फिर भी ताउम्र इंतजार किया।
मैयत पे भी मेरी न आओगे, सोंचा न था।।


शनिवार, 21 दिसंबर 2013

गिद्ध

आज कल घरती पर गिद्ध
हर जगह रहते है..

आज ही तो
आइसक्रीम बेच रहे नन्हें चुहवा पर
चलाया था चान्गुर
गाल पर पंजे का निशान उग आये
बक्क!
आंखों में भर आया
लाल लहू ...

कल ही रेलगाड़ी में भुंजा बेच रहे मल्हूआ पर
खाकी गिद्ध ने मारा झपट्टा
बचने के प्रयास में आ गया वह पहिये के नीचे
सैकड़ों हिस्सों में बंट गया मल्हूआ..

गिद्धों के हिस्से आया एक एक टुकड़ा..

अब तो हर जगह दिखाई देते है गिद्ध

कहीं भगवा, कहीं सेकुलर
तो कहीं जेहादी बन कर
टांग देते है कथित धर्म की धोती
अपने ही बहन-.बेटी के माथे पर
और फिर नोच लेते है उसकी देह
भूखे गिद्धों की तरह...

गांव से लेकर शहर तक पाये जाते है
गिद्ध....

शुक्रवार, 15 नवंबर 2013

बराक ओबामा ने बीबी के डर से सिगरेट पीना छोडा़। ई समाचार पर भोरे भोरे ए गो निम्मन, हंसाबे बाला, मगही कविता...तनि मुस्कुरा के पढ़िया..

जहिना से ओबामा के
अपन मलकीनी से डरे
बाला बात
हमर मलकीनी जनलको हें
तहिना से
रोज हमरा से
लडे़ ले ठनलको हें..

ओलहन सुन सुन के
जब थक गेलियो
हमहूं एक दिन बक देलियो

डारलिंग,
ओबामा तो मलकीनी के डर से
सिरिफ सिगरेट छोड़लको है
तोर हसबेंड तो अपन्न दिल
तोड़लको हैं....
जबसे तों काली माय जीवन में अइला हें
कत्ते फुलझड़िया के ई छोड़लकों हें...

डारलिंग
हमहूं तोरा से बहुते डरो हियो
ईहे से तो
सिरिफ औ सिरिफ
तोरे से प्रेम करो हियो....
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(नोट-
ई कविता जब से हमर कन्याय पढ़लको हें
तहिना से घर में अलगे महाभारत ठनलका हें)

रविवार, 22 सितंबर 2013

रामधारी सिंह "दिनकर" को जन्म दिन पर नमन....

दिल्ली(कविता)  रामधारी सिंह "दिनकर"


यह कैसी चांदनी अम के मलिन तमिर की इस गगन में,
कूक रही क्यों नियति व्यंग से इस गोधूलि-लगन में?

मरघट में तू साज रही दिल्ली कैसे श्रृंगार?
यह बहार का स्वांग अरी इस उजड़े चमन में!

इस उजाड़ निर्जन खंडहर में, छिन्न-भिन्न उजड़े इस घर में
तुझे रूप सजाने की सूझी,इस सत्यानाश प्रहर में!

डाल-डाल पर छेड़ रही कोयल मर्सिया - तराना,
और तुझे सूझा इस दम ही उत्सव हाय, मनाना.

हम धोते हैं घाव इधर सतलज के शीतल जल से,
उधर तुझे भाता है इन पर नमक हाय, छिड़कना!

महल कहां बस, हमें सहारा,केवल फूस-फास, तॄणदल का;
अन्न नहीं, अवलम्ब प्राण का, गम, आँसू या गंगाजल का.

बुधवार, 11 सितंबर 2013

राम की जगह रोटी दे दो..

1
राम की जगह रोटी दे दो, कोई भूखे का भगवान् नहीं होता.
रहीम के बंदों बगैर मुसलम इमां, कोई मुसलमान नहीं होता..

2
पांचों वक्त नमाज पढ़ों या जाओ चारो धाम।

लहू सना हाथ देख रो देगें, अल्ला हो या राम।।


अरुण साथी

शुक्रवार, 6 सितंबर 2013

लैंपपोस्ट

तुफानों की घिरी जिंदगी
डूबती-उतरती रहती है..

कभी सतह पर
तलाशती है कोई
तिनका..

कभी
तलाशती है उसे
जो खोया ही नहीं...

कभी भरकर
मुठ्ठी में रेत
मचल जाती है...

कभी तलाशती है
स्याह
रातों की
सलवटें..

तभी दूर कहीं एक
लैंपपोस्ट
कहती हो जैसे
तुम भी क्यों ने बन जाते हो
मेरी तरह
.
थरथराती हुई सी सही
मेरी रौशनी किसी को
राह तो दिखाती है..
किसी को किनारा तो
बताती है...


सोमवार, 26 अगस्त 2013

सुबह सुबह की थोड़ी चुहलबाजी.... इरशाद कहिए..

1
वोट बैंक
*****
सोनिया मैडम लेकर आई रोटी
मोदी कहते राम नाम की फेरो माला
कहत साथी सुने भाई मतबाला
भूखे भजन न होई गोपाला...

2
रिस्क
****

कोई राम तो कोई रहीम के नाम पे
कर रहा है मैच को फिक्स
गरीबी, बेकारी, मंहगाई को छूने में
है बड़ा ही रिस्क...

3
रेलमपेल
******

नीतीश जी के राज में हो गेलो दारू के रेलमपेल
बड़का औ छोटका सब कलाली में कर रहलो है ठेलढकेल।

गुरुवार, 22 अगस्त 2013

नेता जी उवाच-नाच जमूरे नाच

चुनाव आते ही नेता धर्म की डुगडुगी बजा रहंे हैं।
जमूरे की तरह हमको अपने ईशारे पर नचा रहें हैं।

कहीं टोपी पहन, हमको ही टोपी पहना रहें हैं।
तो कहीं रोटी की जगह शंख फुकबा रहें हैं।

मंहगाई, भूख और भ्रष्टाचार हमसब भूल जा रहें है।
लोमड़ी बन नेता हमारी रोटियों छीन कर खा रहंे हैं।।

बांटो और राज करो का ब्रिटिश फॉर्मुला नेता आजमा रहें है।
गांधी, भगत सिंह और नेताजी की कुर्बानियों को हम भूल जा रहें है।।





शनिवार, 3 अगस्त 2013

फ्रेंडशिप डे

फेसबुक फ्रेंड का इतना सा बास्ता है।
कॉमेंट गिव एण्ड टेक का यह सिंपल सा रास्ता है।।

फेसबुक की ही तरह अब दोस्ती भी मॉडर्न हो गई।
दुख-दर्द में साथ देने का अब चलन ही खो गई।।

फेसबुक फ्रेंड भी अजब गजब होते है।
लड़की के चेहरे में छुपकर लड़के मौज लेते है।।

फेसबुक को कुछ ने मौज मस्ती का साधन बनाया है।
इसलिए अपने शादी शुदा होने की बात को छुपाया है।।

फेसबुक पर कुछ तो कृष्ण-सुदामा की तरह होते है।
कुछ अपनी विलुप्त जमींदारी को यहां भी ढोते है।।

फेसबुक का यह भी आज हो रहा है कमाल।
सात समुंद्र पार से अपने गांव का ले रहा है हालचाल।।


गुरुवार, 1 अगस्त 2013

किसान की छाती

धरती की छाती पर बुन आया है किसान
अपने बेटी के ब्याह की उम्मीद..
उगा आया है खेत में
कुछ रूपये
मालिक के मूंह पर मारने को
जिससे दरबाजे पर चढ़
मालिक रोज बेटी-रोटी करता है...

और इस साल भी
पैरों में फटी बियाई की तरह
फटे खेत को देख
फट रहा है किसान का कलेजा..

अगले साल फिर से
खेतों बोयेगा किसान
एक उम्मीद
एक सपने
और एक नई जिंदगी की आश

सोंचों
घरती की छाती चौड़ी होती है
या कि किसान का.....





सोमवार, 15 जुलाई 2013

भूख, बिल्ली और नेता..


अब कलावती के घर 
बिल्ली भी नहीं आती
समझती है वह 
कई दिनों से खामोश चुल्हे 
और भूख से बिलखते बच्चों का दर्द

पर हे जनतंत्र के कर्णधारों
इतनी छोटी से बात 
तुम क्यों नहीं समझते?

क्यों रोटी की जगह 
धर्म का अफीम देकर
सुला देना चाहते हो हमें
भूखे पेट 
बारबार, लगातार....


शुक्रवार, 31 मई 2013

आंख में पानी नहीं रहा (गजल)


इस दौर में आदमी के आंख में पानी नहीं रहा।
आदमी है, आदमीयत की निशानी नहीं रहा।।

सज गए है घर-गली कागज के फूल से।
बाजार की खुश्बू का असर रूहानी नहीं रहा।।

आप तो मोहब्बत भी करते है सौदे की तरह तौल कर।
अब तो मोहब्बत में लौला-मजनूं की रूमानी नहीं रहा।।

शुक्रवार, 3 मई 2013

घृणा



उस दिन
कथित अधार्मिक 
मठाधीश को
अपदस्त कर 
गांव में जश्न मना
तो मैं भी बहुत खुश हुआ....

चलकर देखने गया
अपनी खुशी

नये मठाधीश
पुर्व में लिखे नाम वाले
शिलापट्टों को तोड़ रहे थे....

पता नहीं क्यों?
इस घृणा को देख
मैं फिर उदास हो गया.....



बुधवार, 17 अप्रैल 2013

देशबा के हाल ( मगही कविता)


(तनि अपन बोली, तनि अपन भाषा। आय सांझ एगो मगही कविता के मन होलै से लिख दिलिऐ। मुदा अपने सबके कैसन लगलै बतैथिन।)

देशबा के हाल
देशबा के हाल भौजी निराला हो गेलो।
लूटेरबा सब हिंया रखबाला हो गेलो।।
देशबा के हाल भौजी निराला हो गेलो।

भूखल मरो हो हरजोतबा किसान।
औ लूटेरबन के रूपैये निबाला हो गेलो।।
देशबा के हाल भौजी निराला हो गेलो।

मांग हलो भोट जे हाथ जोर जोर।
एमएलए बनते मुंहझौंसा मतबाला हो गेलो।।
देशबा के हाल भौजी निराला हो गेलो।

गरीबको के बेटबा जब बनो है एसपी कलेकटर।
ओकरो ले रूपैये शिवाला हो गेलो।।
देशबा के हाल भौजी निराला हो गेलो।



शनिवार, 16 मार्च 2013

शिखर.....(काव्य)


शिखर पर पहुंचना बहुत मुश्किल नहीं है।
साहस
धैर्य
निरन्तर प्रयास
और जुनून हो
तो हर कोई पहुंच सकता है..

मुश्किल है शिखर पर टिक पाना !
अहं
घृणा
विवेक शून्यता की पराकष्ठा से
गिर पड़ता है
शिखर पर पहुंचा हुआ
``आदमी´´
और  टूट का बिखर जाता है.....

सोमवार, 11 मार्च 2013

फेसबुक पर दिल्लगी के कुछ बिखरे हुए टुकड़े


क्या कहूं कैसी हो तुम
बिल्कुल चांद की जैसी हो तुम....

(अभी अभी एक अतिसुंदरी की तस्वीर देख कर बेईमान मन ने शरारत की है....)

मैंने शुरूआत की और फिर जबाब/सवाल/जबाब का दौर चल निकला.


उड़ गई नींद मेरी रातों की

तेरा कैसा सवाल था साथी..



चली जाओगी बेशक मेरी ज़िन्दगी से
 मगर इस दिल से कैसे जाओगी,,,

मोहब्बत ए मरीज का दिल में रहना ही खुशनसीबी है
गौर क्या जाने दर्द, धड़कनों की सदा तुम तो सुनोगे..

वो इस चाह मेँ रहते हैँ कि हम उनको ^ उनसे माँगेँ और
हम इस गुरुर मेँ रहते हैँ कि... हम अपनी ही चीज क्यूँ माँगेँ !!!

गुरूर तो मुझको भी तेरी मोहब्बत का
खो कर भी तुझे, तेरे साथ जीये जा रहा हूं

हमने तेरे बाद न रखी किसी से महोब्बत की आस,
एक शक्स ही बहुत था जो सब कुछ सिखा गया..!!!

इक मोहब्बत ही काफी है जिन्दगी के सफर में
तुमसे फरेब क्या खाया, मुझको भी जीना आ गया..

इश्क वो खेल नहीं जो छोटे दिल वाले खेलें,
रूह तक काँप जाती है, सदमे सहते-सहते..!!!

इश्क तो रूहानी होती है, गफलत न हो
सदमो में जीना सीख जाता है रहते रहते..

सदा है मदन बाबू पहूंच ही जाएगी
अभी चली गई है तो वह लौट कर भी आएगी..


2

‘‘आज रात निंद नहीं आ रही
और कमबख्त मैं सोना भी नहीं चाहता’’

तुम जाग रहे हो मुझको अच्छा नहीं लगता
चुपके से मेरी निंदा चुरा क्यों नहीं लेते..


3

बड़े नामुराद हो, कयामत की बात करते हो

एक मैं हूं की कयामत से भी मोहब्बत कर बैठा..


रविवार, 10 मार्च 2013

अधजली लड़की


कल महाशिवरात्री के दिन ही सृष्टी की रचना करने वाली एक बेटी ने इहलीला समाप्त कर ली। वह भी एक सैतेली मां की प्रताड़ना से आजीज होकर। या मामला प्रेम प्रसंग का भी हो सकता है, छानबीन कर रहा हूं। इससे पूर्व वह अपनी शिकायत लेकर थाना गई थी पर वहां से उसे भगा दिया गया।
शेखपुरा जिले के बरबीघा रेफरल अस्पताल के बेड पर वह कराह रही थी और मेरे आंखों से आंसू बह चले। अविरल। अस्पताल कर्मी अर्जुन लाल की बीस वर्षिय पुत्री नैना ने अभी जिंदगी की दहलीज पर कदम ही रखा था ओह...
(आंसू के साथ साथ ये शब्द भी छलक पड़े...)

कैसे निर्वस्त्र पड़ी थी
वह अधजली लड़की
कराहती हुई
रोकने की कोशीश
बेकार कर 
बह चला आंखों का समुंद्र
ओह
आखिर कब तक
जलती रहेगी 
बेटियां?

हे ईश्वर
तुम भी मुझे 
अपनी ही तरह
पत्थर का बना क्यूं नहीं देते....