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बुधवार, 8 अगस्त 2018

अंधेरा

चलो फिर से आंधियों को हवा देते है,
चलो हर एक चरागों को बुझा देते है!!

ये रौशनी ही फसाद करती है "साथी",
चलो इस गांव में अंधेरे को बसा देते है!!

है गर कोई गुस्ताख़ चरागों को बचाने वाला,
चलो सबसे पहले हम उसको ही मिटा देते है!!

जरा भी खलल न हो सके अंधेरों की दुनिया में,
चलो अब इस जमाने से आदमी को मिटा देते है!!
अरुण साथी (09/08/2018)

शुक्रवार, 14 अप्रैल 2017

शगल

जिंदगी का अजीब फ़लसफ़ा है,
हर एक आदमी दूसरे से खफा है!

गैरों के गुनाहों का बही-खाता है सबके पास,

बस अपने गुनाहों का हिसाब रफा-दफा है!

तौहीन करने का शगल ऐसा है उनका,
खुद ही तोहमत लगा लेते कई दफा है!

किसपे करूं यकीन कहो तो "साथी",
करो भरोसा जिसपे मिलती जफ़ा है!!

शुक्रवार, 31 मई 2013

आंख में पानी नहीं रहा (गजल)


इस दौर में आदमी के आंख में पानी नहीं रहा।
आदमी है, आदमीयत की निशानी नहीं रहा।।

सज गए है घर-गली कागज के फूल से।
बाजार की खुश्बू का असर रूहानी नहीं रहा।।

आप तो मोहब्बत भी करते है सौदे की तरह तौल कर।
अब तो मोहब्बत में लौला-मजनूं की रूमानी नहीं रहा।।