बुधवार, 4 मई 2011

मेरे महबूब

मिजाजे महबूब को न जान पाया मैंने।
उनकी खुशी में खुशी, उदासी में मातम मनाया मैंने।। 


महबूब के दामन में हो फूलों की महक।
चमन के खार को अपना बनाया मैंने। 


महबूब के आंखों में देखी जब भी नमी।
कोने में छूप कर आंसू बहाया मैंने।  


महबूब के होठों की एक हल्की हंसी। 
जमीने दोजख में भी जन्नत पाया मैंने।।  


दर्द तो मेरे सीने में भी बहुत है हमदम। 
तुम उदास न हो जाओं, उसको भी छुपाया मैंने।।

7 टिप्‍पणियां:

  1. दर्द तो मेरे सीने में भी बहुत है हमदम।
    तुम उदास न हो जाओं, उसको भी छुपाया मैंने।।
    wah....behad achchi lagi.

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  2. महबूब के आंखों में देखी जब भी नमी।
    कोने में छूप कर आंसू बहाया मैंने।

    बहुत बढिया, क्या बात है

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  3. महबूब के आंखों में देखी जब भी नमी।
    कोने में छूप कर आंसू बहाया मैंने।
    man ko choo lene vali panktiyan .bahut khoob .badhai .

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  4. sathi saheb aapka yah andaj bahut achha laga akhiri sher to vah vah .....

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  5. बहुत सुन्दर अभिव्यक्ति| धन्यवाद|

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  6. सुन्दर अति सुन्दर सटीक अभिव्यक्ति.........

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