मंगलवार, 27 सितंबर 2016

दासी लोकतंत्र

दासी लोकतंत्र
**
साथी उवाच

"क्यों
जनतंत्र में
मालिक जनता
भूखी और प्यासी है?

राजा के घर क्रंदन
क्यों है?

क्यों मुख पे
छाई उदासी है?"

**
बकलोल उवाच

"क्योंकि
लोकतंत्र तो
वंशवादी,
जातिवादी,
धर्मवादी,
नेताओं के
चरणों की दासी है।।।
(शपथ ग्रहण के बाद उत्तरप्रदेश के मुखिया मुलायम सिंह के पैरों में लटके मंत्री गायत्री प्रजापति प्रसंग पे)

शनिवार, 17 सितंबर 2016

भूख और माँ

भूख और माँ

(सोशल मीडिया पे वायरल इस तस्वीर को देखकर साथी के शब्द.. निःशब्द..)
**
जिंदगी है
मौत है
और है
मौत से भी
भयावह
क्रूर
बर्बर
भूख..

इसीलिए तो
भूख और माँ
की लड़ाई में
भूख जीत जाता है
माँ हार जाती है..
अक्सर..

बुधवार, 14 सितंबर 2016

भक्त

"भक्त"
**
"अच्छे दिन"
और
"काला धन"
को जुमला
कहे जाने पर भी
जो आसक्त रहते है,

हे तात
कली काल में
उसे ही
भक्त कहते है..
----
#साथी के #बकलोल वचन



रविवार, 11 सितंबर 2016

प्रहसन

यह एक प्रहसन है
लोकतंत्र का प्रहसन
यहाँ
लिखी गयी पटकथा पे
अभिनय करते है
लोग

तभी तो
वही लोग
जो कल तक
रावण को मानते थे
राक्षस,
आज अचानक
भगवान् मानने लगे..!

वही लोग
जिनके लिए पाप था
सीता का
अपहरण
द्रोपदी का
चीरहरण
लाक्षागृह दहन
दुर्योधन का
अत्याचार,
आज इसे ईश्वर की
इच्छा मानने लगे..

वही कृष्ण
जाने कैसे
कुरुक्षेत्र में
आकर
कहने लगे

"हे तात
लाभ-हानि
जीवन-मरण
यश-अपयश
सब कुछ विधि हाथ..

गुरुवार, 8 सितंबर 2016

तूती की आवाज



कातिल को कातिल कहो, रवायत नहीं है।

फ़क़त मुर्दों से ज़माने को शिकायत नहीं है!!

मुर्दों के शहर में रहकर भी शोर क्यों करते हो,
यह कब्र में सोये हुए बंदों से अदावत नहीं है?


बस्ती है यह चोरों का, जयकारा उसका होगा,
सच कहना क्या इस दौर में कयामत नहीं है?


जब नक्कारखाने में मुनादी है खामोश रहने की,
वैसे में तेरा शोर, "तूती" बनने की कवायद नहीं है?

बुधवार, 3 अगस्त 2016

धुंधले रिश्ते

जिंदगी अब कहाँ किसी
सिरहाने टिकती है।
हर एक रिश्तों की अब
धुंधली सी तस्वीर दिखती है।।

◆कोई होकर भी अपना,
कभी अपना न हुआ।
किसी की जिंदगी गैरों
की खातिर ही बिकती है।।

◆जाने क्या रिश्ता है
अपना उनसे।
वो पगली मुझे देख कर
बेवजह हंसती है।।

◆देखा है अलग अलग
चेहरे रिश्तों के यहाँ,
सुना है रिश्ते भी अब
ब्यूटी पार्लरों में सजती है।।



शनिवार, 23 जुलाई 2016

आईये यूँ नागपंचमी मनाते है..

आईये यूँ 
नागपंचमी मनाते है..
*अरुण साथी*
कुछ तथाकथित 
दोस्तों को
आदर सहित 
घर बुलाते है
और उनको
भरपेट दूध पिलाते है..
**
आईये यूँ 
नागपंचमी मनाते है..
**
कुछ तथाकथित 
सेकुलरों के घर जाते है
और उनको दूध पिलाकर
आस्तीन का सांप 
होने का अर्थ समझाते है..
**
आईये यूँ
नागपंचमी मनाते है...
**
कुछ तथाकथित राष्ट्रवादी
भक्तों को दूध सुँघाते है
उनको उकसाते है
और फिर
उनकी जिह्वा से निकली
गलीज गालियों के बीच
कालिया नाग और 
उनके बीच की समानता का
अर्थ उन्हें समझाते है...
**
आईये यूँ 
नागपंचमी मनाते है..
**
कुछ तथाकथित 
मुल्लों-मौलवियों
पण्डे-पुरोहितों
जकीरों-ओवैसियों
साध्वियों-योगियों
को धर लाते है
उनके बिष के 
दाँत तोड़कर
उन्हें देशभक्ति का
पाठ पढ़ाते है..
**
आईये यूँ,
नागपंचमी मनाते है...

मंगलवार, 12 जुलाई 2016

छिछियैनी दुर्गन्ध

छिछियैनी दुर्गन्ध 

(अरुण साथी)


बोन चाइना की

कशीदाकारी प्लेट में

जब गोश्त का टुकड़ा डाला

तो अजीब सी छिछियैनी

दुर्गन्ध आई...


पांच सितारा भव्यता

लेज़र लाइटिंग की चकाचौंध

ह्रदय गति को

स्तंभित करती

डीजे की धूम-धड़ाक में भी

यह छिछियैनी सी दुर्गन्ध

जानी पहचानी सी लगी..


ओह,

यह तो वही छिछियैनी सी दुर्गन्ध है

जो आज ही अस्पताल में पड़ी

दहेज़ के लिए जली 

एक बेटी की

देह से आ रही थी..


ओह, ओह, ओह

बुधवार, 15 जून 2016

अभी हारा नहीं हूँ मैं...

नहीं
अभी हारा नहीं हूँ मैं..
गिरा भर हूँ
मुँह के बल ही सही
गिर जाना
हारना नहीं होता..

फिर उठ कर चलूँगा
एक एक कदम ही सही
मंजिल की ओर
जीतने के लिए

और
जबतक
जीतने का जुनून बाकि है
हारा हुआ मत समझना मुझे
सुना की नहीं
सुन तो लो सही
हारा हुआ मत समझना..

गुरुवार, 26 मई 2016

साथी के बकलोल वचन

साथी के बकलोल वचन
😶😶😶
बिहार में आईलो ई कइसन विहान,
लगो हे जैसे ई हो गेल अफगान !

कहिनो मर्डर, कहिनो किडनैप,
कहिनो रंगदारी त कहिनो हुड़दंग।
कजै नै हे सुरक्षा, घर कि दालान,
लगो हे जैसे ई हो गेल अफगान !

कहिनो मरे पत्रकार अ कहिनो व्यपारी,
गुंडागर्दी करे हे अदमी सरकारी।
एमएलए करे रेप औ चले सीना तान।
लगो हे जैसे ई हो गेल अफगान!

आम अदमी के त जहाँ तहाँ बम से उड़ाबे हे,
पुरनका सीएम के गाड़ियों जराबे हे।
कैसु बेचारा मांझी बचैलका अपन जान।
लगो हे जैसे ई हो गेल अफगान!⁠⁠⁠⁠

साथी के बकलोल वचन

साथी के बकलोल वचन
😶😶😶
बिहार में आईलो ई कइसन विहान,
लगो हे जैसे ई हो गेल अफगान !

कहिनो मर्डर, कहिनो किडनैप,
कहिनो रंगदारी त कहिनो हुड़दंग।
कजै नै हे सुरक्षा, घर कि दालान,
लगो हे जैसे ई हो गेल अफगान !

कहिनो मरे पत्रकार अ कहिनो व्यपारी,
गुंडागर्दी करे हे अदमी सरकारी।
एमएलए करे रेप औ चले सीना तान।
लगो हे जैसे ई हो गेल अफगान!

आम अदमी के त जहाँ तहाँ बम से उड़ाबे हे,
पुरनका सीएम के गाड़ियों जराबे हे।
कैसु बेचारा मांझी बचैलका अपन जान।
लगो हे जैसे ई हो गेल अफगान!⁠⁠⁠⁠

बुधवार, 30 मार्च 2016

मैं जागो मांझी बोल रहा हूँ, हाँ मैं भूख से नहीं मरा..

मैं जागो मांझी बोल रहा हूँ, हाँ मैं भूख से नहीं मरा..

(अरुण साथी)

हाँ मैं जागो मांझी ही बोल रहा हूँ
गलत है कि मैं मर गया हूँ
मैं मर कैसे सकता हूँ
मैं तो बोल ही रहा हूँ
कि मैं भूखा हूँ
मुझे रोटी दो
पर सुनेगा कौन?
इस कब्रिस्तान में?

समूचा शहर ये कब्रिस्तान है
जिसमे रहते है साँस लेते
चलते, बोलते लोग

और इसी कब्रिस्तान का राजा
को मेरे भूखे होने की आवाज
नागवार लगी है
इसी लिए उन्होंने
मेरे शारीर को
चिड़फाड़ कर
यह साबित किया
कि मैं भूखा नहीं हूँ

हे महाराज
मैं अकेला नहीं
बोल रहा हूँ
लाखों है बोलने वाले
कि मुझको ही मेरे हिस्से का
राशन नहीं मिलता,

हे महाराज
मेरे जैसों की क्रंदन को
सुनो तो,

और सुनो तो
कि मरने के बाद भी
जागो मांझी क्या बोल रहा है..

हाँ मैं भूख से नहीं मरा,
मैं तो मरा हूँ
इस व्यवस्था कि
अकर्मण्यता से
निर्लज्जता से
संवेदनहीनता से

मैं तो मरा हूँ
छीन लिए गए
मेरे हिस्से के
उन
निवाले कि वजह से
जो
नोटों की शक्ल में
तुम्हरी तिजोरी में बंद है

सुनो तो सही
मैं जागो मांझी बोल रहा हूँ...

(भूख से मरे जागो मांझी की खबर करने के बाद)

सोमवार, 21 मार्च 2016

उल्टी करता आदमी.

उल्टी करता आदमी..

पता नहीं क्यों
दूसरों की वनिस्पत
कुछ आदमी में बड़ी कमी होती?

दूसरे
हजम कर जाते है
बहुत कुछ
कई तो सबकुछ
जैसे वो
आदमी नहीं
तिलचट्टा हो
सर्वाहारी...

कुछ
उल्टी कर देते हैं
हज़म नहीं कर सकते
सबकुछ
जैसे कि
सामाजिक बिसंगति
धार्मिक थोथापन
जातिय उन्माद

और कर देते है उल्टी
कहीं किसी समाज में
कहीं किसी देश में
कहीं किसी सोशल मीडिया में...
सच है
उल्टी करने वालों को भला
कौन पसंद करेगा
फिर भी
कुछ लोग है उल्टी
करनेवाले
तभी बची है दुनिया..

शनिवार, 6 फ़रवरी 2016

रोज डे पे साथी के बकलोल वचन

रोज डे पे साथी के बकलोल वचन
(अरुण साथी)
🌹🌹🌹
रोज डे पे श्रीमती जी को
जब गुलाब दिया
तो उसके चेहरे पे
प्रेम का भाव नहीं पाया,
मैं अत्यधिक घबराया,
मन में संशय आया,
कहीं किसी ने
मुझसे पहले तो
गुलाब नहीं थमाया!
🌹🌹🌹
पूछा,
"प्रिय, अपनी शादी के
सिल्वर जुबली बर्ष पे भी
मैंने तुम्हें ही गुलाब थमाया,
फिर तुमने
मेरे रगो के खौलते लहू में
अपनी शीतलता का
भाव क्यों मिलाया?"
😡😡😡
श्रीमती जी और भड़क गयी,
"कलमुहें,
क्या मैं तुम्हें
जानती नहीं?

जरूर यह गुलाब किसी
कलमुंही के लिए ख़रीदा होगा,
मेरे लिए तो आज तक
एक बिंदी भी नहीं लाया....!

जानता नहीं कि
बासी कढ़ी में उबाल नहीं आता।

तुम गधे मर्द तो
सुहागरात के अंधे होते हो,
तुम्हें हमेशा दूसरी
तरफ की सूखी घांस भी
हरी हरी
नजर है आती है,
दूसरी वाली जरलाही भी
मन को भाती है,
अपनी बीबी तो
हर बात पे काट खाती है..।

मैं तो अवाक रह
सोचने लगा,
बीबी और मोदी जी में
कितनी समानता है,
एक "मन की बात" करते है,
एक "मन की बात" पकड़ती है..।
मोदी भी अकड़ते है,
बीबी भी अकड़ती है...।।।

शुक्रवार, 5 फ़रवरी 2016

पहली सी मोहब्बत नहीं रही....



























उनको अब मुझसे शिकायत नहीं है,
शायद अब पहली सी मोहब्बत नहीं रही।

दुश्मनों से भी हंस-बोल लिया करते थे,
शायद अब पहली सी अदावत नहीं रही।

इन्कारे-ए-मोहब्बत पर तेजाब फेंक देते हैं,
शायद अब पहली सी इश्के-रवायत नहीं रही।







रविवार, 31 जनवरी 2016

ब्रह्मपुत्र













स्वर्ण देश का
प्रजापालक था वह..


स्वर्ग में सीढ़ी लगाने,
समुन्द्र जल मीठा करने का
राष्ट्रवादी स्वप्नद्रष्टा था वह..


वह प्रकांड ब्राह्मण
और ब्रह्मपुत्र था...


वह भक्त था,
महाभक्त,
महाकाल का..


सर्वगुण सम्पन्न था वह..

बस,
वह अहंकारी था
और
रावण कहलाया..!

गुरुवार, 21 जनवरी 2016

बिहार में बहार हो!!

#साथी के #बकलोल_वचन कड़ी में  मगही कविता के माध्यम से बिहार के दर्द के आवाज देलियो हें।

बिहार में बहार हो!!

बिहार में आईलो ई कईसन बहार हो?
जन्ने देखहो ओन्ने गोलिये के बौछार हो!!
हत्या, लूट, रंगदारी तो जेनरल बात हो,
अपहरण के चकाचक चललो रोजगार हो!!
बिहार में आईलो ई कईसन बहार हो?
व्यपारी, दरोगा औ इंजीनियर के मारे गोली!
अदमि के जान जैसे गजरा-मुराय हो..!!
बिहार में आईलो ई कईसन बहार हो?
रोड रॉबरी, घर में डाका औ होबो हो छिनतई,
बैंक डकैती तो जैसे पर डे के कारोबार हो!
बिहार में आईलो ई कईसन बहार हो?
छोटका भाय; कुर्सी पाय, खूब नितराय!
बड़का भाय; सपरिवार, सिरोरे मलाय हो!!
बिहार में आईलो ई कईसन बहार हो?

सोमवार, 18 जनवरी 2016

साथी के बकलोल वचन (जंगलराज आयो)

कुख्यात पति मंडल को
एमएलए पत्नी भारती
ने थाने से छुड़ायो,
😡😡😜
थानेदार को
कान के नीचे दो बजायो,
👋🏿👋🏿👋🏿
फिर समझायो,
🐶🐶🐶
पता नहीं तोको,
बिहार में जंगलराज आयो..
🐯🐯🐯
#साथी के #बकलोल_वचन

मंगलवार, 10 नवंबर 2015

अप्प दीपो भवः
























अप्प दीपो भवः
**
दीया हमें बताता है।
जलना हमें सिखाता।।
**
छाये जब घंधोर अँधेरा,
दीया नहीं घबराता है।।
**
पहले जलता एक दीया,
फिर असंख्य बन जाता।।
**
जलता है जब एक दीया,
तब अंधकार मिटाता है।।
**
दीपावली की हार्दिक शुभकामनायें....

बुधवार, 9 सितंबर 2015

एक निराशावादी कविता


















समुन्द्र किनारे
तूफानी तरंगों से
बचते-बचाते
बनाया जिसे
उस घरौंदे को

जाने क्यूँ
मिटा देने का 
मन करता है...

बचपन
जवानी
जीवन 
और
रेत का घरौंदा

गुरुवार, 3 सितंबर 2015

फगुनिया

फगुनिया
***
रे फगुनिया
सुन रही है रे तू
ठन ठन, ठनाक
यह छेनी
हथौड़ी
की आवाज़ नहीं है रेयह प्रेमी की
हाँक है
हनक है
सनक है


सुन रे फगुनिया
यह तुझे
स्वर्ग में भी सुनाई देगी
रे फगुनिया
प्रेम की ताकत है यह रे
पहाड़ का छाती तोड़ दिया इसने
और हमेशा की ही तरह
चूर चूर कर दिया
अहँकार का सीना...
रे फगुनिया
देख तो
यह शहंशाह का
ताजमहल नहीं है रे
यह गरीब का प्रेम है
निर्मल प्रेम
गहलौर घाटी के हर पत्थर पे
तेरा नाम गुदा है रे
रे फगुनिया..
सुन रही है रे
सुन तो

(बिहार के गया के गहलौर में दशरथ मांझी के द्वारा पत्नी के निधन के बाद बाईस सालों तक तक पहाड़ तोड़ कर रास्ता बना दिए जाने के बाद कुछ शब्द ...)

रविवार, 23 अगस्त 2015

एक सवाल















एक सवाल 
**
सवाल यह नहीं है
कि हम अपनों के लिए 
क्यूँ करते है
कर्म-कुकर्म 
पुण्य-पाप..?

**
सवाल तो यह भी नहीं है 
कि हम अपनों के लिए 
जीते क्यूँ है..?

**
सवाल तो यह है 
कि हमारा अपना है कौन....?

गुरुवार, 16 जुलाई 2015

अपनी लाश को ढोना...



















(अपनी वेदना को शब्द दी है, बस...)

पहाड़ सी जिंदगी 
का बोझ पीड़ादायी होता है..

उससे अधिक
पीड़ादायी हो जाता है
किसी अपने का 
पहाड़ सा 
दिया हुआ दुख....

और जब
आदमी 
अपनी ही लाश को
ढोते हुए जीने लगता है,
तब
उस असाह्य
पीड़ा के प्रति भी
वह संवेदनहीन सा हो जाता है!

जाने क्यूं...?


(चित्र- गूगल  देवता से उधार लिया हुआ)

सोमवार, 6 जुलाई 2015

निराश मत हो...

शनै: शनै:
अस्ताचल की ओर
जाते सूरज को देख
बहुत आशान्वित हो जाता हूं,
जैसे 
उर्जा की एक नई किरण
समाहित हो अन्तः को
जागृत कर रही हो....
.........
जैसे 
कह रही हो,
फिर होगी सुबह,
फिर निकलेगा सूरज,
नई उर्जा,
नई आशा,
नया दिन और
नई चुनौतियों के साथ,

निराश मत हो...


(तस्वीर- मेरे गांव में डूबते सूरज की)

शुक्रवार, 10 अप्रैल 2015

"साथी" ने अर्ज़ किया है..

थोड़ी संजीदगी, थोड़ा एहसास दे दे ।
ऐ मोहब्बत, उनको भी मेरी प्यास दे दे ।।
***
उनकी बेवफाई का कहीं शिकवा न करूँ ।
अपनी मोहब्बत को कहीं रुस्बा न करूँ ।।
ऐसी इल्म कोई खास दे दे ।।
ऐ मोहब्बत, उनको भी मेरी प्यास दे दे ।।
***
शकून से ही जिंदगी गुजर नहीं होती ।
गम के बगैर जिंदगी मुख़्तसर नहीं होती ।।
मेरे महबूब को ये थोड़ी सी जज्बात दे दे ।
ऐ मोहब्बत, उनको भी मेरी प्यास दे दे ।।
***
जिस्म तो बाजारू है, सिक्कों पे बिका करती है ।
हुश्न का टूटता गरूर कोठो पे दिखा करती है ।।
मेरी सदा रूह तक पहुंचे, ऐसी कोई हालात दे दे ।
ऐ मोहब्बत, उनको भी मेरी प्यास दे दे ।।
***