गुरुवार, 14 अप्रैल 2011

अन्नागिरी



जब अन्ना ने लिया संकल्प
लोकतंत्र को बचाने का
जन लोकपाल लाने का
और
भ्रष्टाचार मिटाने का
तब
पूरा देश अन्ना के साथ
खड़ा हो गया।

किसी ने कहा
लौट आये गांधी
किसी ने कहा
आई आंधी
तुमने भी बुराई के विरूद्ध उठाया हाथ
अन्ना का दिया का दिया साथ।

पर
रूको
और मुठ्ठी भींच लो
दुनीया की छोड़ो
अपनी सीमा रेखा खींच लो
भ्रष्टाचार नहीं करेगें
भ्रष्टाचार नहीं सहेगें

फिर सफल होगें अन्ना
पूरा होगा गांधी का सपना...

9 टिप्‍पणियां:

  1. पर
    रूको
    और मुठ्ठी भींच लो
    दुनीया की छोड़ो
    अपनी सीमा रेखा खींच लो
    ........................
    बहुत सुन्दर कविता और ये पंक्तिया इस कविता का ह्रदय लगती हैं..
    हमें अपनी सीमा रेखा खीचनी होगी...खुद में बदलाव लाये बिना सम्पूर्ण क्रांति संभव नहीं है..

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  2. सुंदर अभिव्‍यक्ति। आभार।

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  3. सच है! ना रिश्वत दो ना लो! और वोट ध्यान से दो ना कि पैसा लेकर या फिर जाति के आधार पर!
    विवेक जैन vivj2000.blogspot.com

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  4. हर तरफ अन्ना ही अन्ना छाए हैं...
    बहुत सुंदर रचना....

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  5. .

    पर
    रूको
    और मुठ्ठी भींच लो
    दुनीया की छोड़ो
    अपनी सीमा रेखा खींच लो..

    Well said ! Charity begins from home.

    .

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  6. सच कहा है ... जब तक खुद हम नही जागेंगे तब तक सवेरा नही होगा ...

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