मंगलवार, 9 मार्च 2010

अब बैताल डाल डाल

आज हर जगह पाये जाते है
जिवित बैताल
संवेदनहीन
निष्प्राण
और तािर्ककता से भरपूर
आज घरों में भी
टंगने पर टंगा रहता बैताल।
दफ्तर में बाबूओं की
फाइलों से लेकर,
नेताओं की टोपी पर बैठा
पूछता रहता है सवाल।

अब तो बैताल संसद में भी नज़र आने लगे है।
संवेदनहीन होने के लिए, संवेदनाओं को जगाने लगे है।

महिला बिल से लेकर,मण्डल के कमण्डल तक।
संसद के बाहर-भीतर, उछलते नोटों के बण्डल तक।

बैतलवा डाल डाल गीत गाने लगे है।
हद तो यह कि आज बिक्रमादित्य भी दूर बैठकर
मुस्कुराने लगे है।

1 टिप्पणी:

  1. waah waah !!
    kya sahi tulna hui hai 'vikram aur betaal' ki aaj ke sandharbh mein ek bahut hi saarthak kavita rach di aapne..

    बैतलवा डाल डाल गीत गाने लगे है।
    हद तो यह कि आज बिक्रमादित्य भी दूर बैठकर
    मुस्कुराने लगे है।

    aur ye panktiyaan to bas kamal ki hain..
    badhaii sweekar kijiye...

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