शनिवार, 1 फ़रवरी 2014

वह मुझकों भी काफिर कहने लगा है..

अब कोई क्यों मुझसे खफा हो।
मैं खुद से ही खफा रहने लगा हूं।।

गैरों से अब शिकवा कैसा।
अपनों का तंज सहने लगा हूं।।

चापलूसों के दौर में सच बोल न दूं कहीं।
इसलिए मैं अक्सर चुप रहने लगा हूं।।

कहता हूं गर मोहब्बत ही है खुदा का मजहब।
वह मुझकों भी काफिर कहने लगा है।।

3 टिप्‍पणियां:

  1. बहुत खूब .. तंज लिए हर शेर .. लाजवाब ...

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  2. प्रशंसनीय रचना - बधाई

    आग्रह है-- हमारे ब्लॉग पर भी पधारे
    शब्दों की मुस्कुराहट पर ....दिल को छूते शब्द छाप छोड़ती गजलें ऐसी ही एक शख्सियत है

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