शनिवार, 26 मई 2012

देवता के होने पर सवाल उठाता राहू-केतू


कई बार जिंदगी को जीते हुए खामोशी से बिष पीना पड़ता है, कहीं कोई धन का तो कहीं कोई विद्वता का विष वमन कर देता है। मन में एक टीस सी उठती है और फिर कलम से कविता निकल पड़ती है। कहीं कहीं देवता साबित करने के लिए लोग क्या क्या नहीं करते, अपनी बुराईओं को भूल आप पर सवाल खड़े करते है, मैं आज देवता के होने पर ही सवाल खड़ा कर रहा हूं. आप प्रतिक्रिया दे, थोड़ी देर रूक कर पढ़े.... फिर कुछ कहते जाए...


अमृत बंटते समय
मैं भी खड़ा हो जाता
देवाताओं की पांत में
पर मैं राहू की तरह साहसी नहीं था...

पर आज भी राहू-केतू
साहस से
शापित होकर भी
सवाल खड़े किए हुए हैं
देवताओं के देवता होने पर...

सवाल
जो उठता है
देवताओं के अमरत्व पर
उनके छल पर...

भले ही नहीं सुनो
पर पूछोगे तो कभी...

"कि" इस नक्कारखाने में
तूती की यह आवाज कहां से आ रही है...

7 टिप्‍पणियां:

  1. की इस नक्कारखाने में
    तूती की यह आवाज कहां से आ रही है...

    ''कि‍'' इस नक्कारखाने में
    तूती की यह आवाज कहां से आ रही है...

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  2. देवताओं के होने पर सवाल....????
    रुकी बहुत देर...मगर कहा कुछ ना गया...

    अनु

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  3. देवताओं के संबंध में बहुत ही अच्छी प्रस्तुति । मेरे नए पोस्ट कबीर पर आपका इंतजार रहेगा । धन्यवाद ।

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  4. पर मैं राहू की तरह साहसी नहीं था...

    पर आज भी राहू-केतू
    साहस से
    शापित होकर भी
    सवाल खड़े किए हुए हैं
    देवताओं के देवता होने पर...
    बेहतरीन भाव प्रस्‍तुत किये हैं आपने ...आभार ।

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  5. बहुत प्रभावी .. समाज में उठते प्रश्नों के जवाब मिलें या नहीं पर उनका उठते रहना जरूरी है ... तभी कोई समाधान भी संभव होगा ...

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  6. हर युग में देवता हुए और देवता बने रहने के लिए छल भी हुआ ...ये हर कोई जानता हैं ..........बेहद सार्थक लेखनी ..

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