रविवार, 20 मई 2012

संगमरमर का आदमी



तुम तो कहते थे अमीरे शहर जन्नत होती है।
मैंने तो यहां संगेमरमर का आदमी देखा।।

तुम तो कहते थे इसके लिए है दीवानी दुनिया।
मैंने तों यहां से भागने की छटपटाहट देखी।।

तुम तो कहते थे बहुत शकूं है यहां।
उसने तो मुझसे ही शकूं का पता पूछा।।

6 टिप्‍पणियां:

  1. वाह...अद्भुत रचना...बधाई स्वीकारें.

    नीरज

    उत्तर देंहटाएं
  2. वाह ...बहुत खूब अनुपम भाव ।

    उत्तर देंहटाएं
  3. यहाँ हर इंसान ...अपनी ही परछाईं से भागा फिरता हैं ...

    उत्तर देंहटाएं
  4. गहन भाव अभिव्यक्ति ....

    उत्तर देंहटाएं
  5. kuchh to mile lab e shirin se
    zahar khane ki ijazat hi sahi

    उत्तर देंहटाएं