सोमवार, 23 जनवरी 2012

गांव का अंधविश्वास और विलुप्त नैतिकता।


गांव में
उड़ते हुए नीलकंठ को देखना शुभ है
और यात्रा पर निकलते हुए यात्री
ढेला मार कर इसे उड़ते है....

और कौआ
छप्पर पर बैठ कर जब करता हैं
कांव कांव
तो मेहमान के आने की सूचना हो जाती है

और टीटहीं के बारे में कहते है कि
यह टांग उपर कर सोता है
आकाश कहीं गिरा तो यह
रोक लेगी उसे...

यहां तक की लक्ष्मी की सवारी उल्लू को
भी अशुभ मानते है गांव के लोग

या फिर गिद्ध का घर पर बैठ जाना
माना जाता है अशुभ।
अजीब अंधविश्वासी होते है गांव के लोग भी....


शहरों मंे
लक्ष्मी भी रहती है
और टांग को उपर किए
टिटहीं-लोग भी..

हर जगह मिल जाएगें गिद्ध
और कौआ भी

पर शहरों मंे
नैतिकता, प्रेम और ईमानदारी की तरह
नीलकंठ हो गया विलुप्त..

10 टिप्‍पणियां:

  1. जो भी कहिये , कुछ अंधविश्वास में भी एक आत्मविश्वास था ... अब तो क्या शहर क्या गाँव , न विश्वास न अंधविश्वास .... रह गया है यक ख्याल - अहम् ब्रह्मास्मि

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  2. पुराने लोगो का दिया आत्म विस्वास,आज अंध विस्वास बन गया...
    बहुत सुंदर रचना,...
    WELCOME TO new post...वाह रे मंहगाई...

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  3. अविश्वास,व अनैतिकता से कहीं अच्छा था वह अन्धविश्वास । कम से कम एक आधार तो होता था सोचने व देखने का ..। अच्छी रचना । 4 नवम्बर तक की रचनाएं देखीं सभी अच्छी लगीं ।

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  4. अविश्वास,व अनैतिकता से कहीं अच्छा था वह अन्धविश्वास । कम से कम एक आधार तो होता था सोचने व देखने का ..। अच्छी रचना । 4 नवम्बर तक की रचनाएं देखीं सभी अच्छी लगीं ।

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  5. बहुत सुन्दर प्रस्तुति!
    --
    गणतन्त्रदिवस की पूर्ववेला पर हार्दिक शुभकामनाएँ!
    --
    आपकी इस प्रविष्टी की चर्चा आज के चर्चा मंच पर भी की गई है!
    सूचनार्थ!

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  6. इस टिप्पणी को लेखक द्वारा हटा दिया गया है.

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  7. बहुत सही तरीके से अपनी बात रखी हैं आपने ...बहुत खूब

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  8. पर शहरों मंे
    नैतिकता, प्रेम और ईमानदारी की तरह
    नीलकंठ हो गया विलुप्त..\

    ak behtareen abhivykti .....blog pr aana achha laga.....sundar rachana ke liye badhai.

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