गुरुवार, 1 दिसंबर 2011

औरत केवल औरत नहीं होती..



औरत केवल औरत नहीं होती..

वे होती एक मां
जिनकी आंचल में पलती है 
जिंदगी।

वे होती है एक पत्नी 
जिनकी आंचल में पलता है
प्यार।

वे होती है बहन-बेटी 
जिससे आंगन मे पलता है
दुलार.

औरत केवल औरत नहीं होती
वे है तो होता ईश्वर के होने का एहसास...

8 टिप्‍पणियां:

  1. बहुत ही सही कहा...

    सुन्दर रचना...

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  2. औरत कोई हाड-मांस का पुतला नहीं,बल्कि एक खूबसूरत एहसास है !

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  3. बहुत सुन्दर और सटीक व्याख्या किया है आपने औरत के बारे में! लाजवाब प्रस्तुती!

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  4. वाह...बेजोड़ भावाभिव्यक्ति...बधाई स्वीकारें

    नीरज

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  5. सच कहा है .. औरत इश्वर का वरदान है ... हर रूप में संभालती है ...

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