शनिवार, 3 दिसंबर 2011

सुबह की कुछ क्षणिकाऐं


1
सत्ता और विपक्ष।
उनके रूठने की अदा सुभानअल्ला,
उनके मनाने की अदा माशाअल्ला।
हम भी है वाकिफ इस याराने से,
अब कैसे बचे देश इस शातिराने से।

2
मीडिया।
अब तो चौथेखंभे के गिरने का सवाल उठता है,
जिन सवालों के लिए थे वो, उसपर सवाल उठता है।
हर सवालों के सवाल से हम वाकिफ है,
ना खुदा तुम नहीं, तुमको भी खुदा हाफीज है।।

3
नैतिकता
नहीं आसां है यह करना,
है मुश्किल बड़ा खुद से लड़ना।
मेरी भी आदत है कि मैं चुप रहता हूं,
जो भी हो, आदत है इसी के साथ रहता हूं।।


4
हौसला, प्यास से बड़ी होती है,
मंजिल उसी के तलाश में खड़ी होती है।

5
जाग उठा है देश, बस आवाज बुलंद रखिए,
अन्ना अन्ना अन्ना,
बस यही साज-ओ-छंद रखिए..



11 टिप्‍पणियां:

  1. awaz buland ho ....yahi asha jagaya hai apne is kavita me...badhiya prastuti

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  2. सुन्दर शब्दावली, सुन्दर अभिव्यक्ति.

    कृपया मेरी नवीन प्रस्तुतियों पर पधारने का निमंत्रण स्वीकार करें.

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  3. जाग उठा है देश, बस आवाज बुलंद रखिए,
    अन्ना अन्ना अन्ना,
    बस यही साज-ओ-छंद रखिए..

    वाह अरुण जी सुबह सुबह इतनी सुंदर क्षणिकाएं.
    बस मज़ा आ गया.

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  4. अब तो चौथेखंभे के गिरने का सवाल उठता है,
    जिन सवालों के लिए थे वो, उसपर सवाल उठता है।
    हर सवालों के सवाल से हम वाकिफ है,
    ना खुदा तुम नहीं, तुमको भी खुदा हाफीज है.....

    Lovely lines...

    .

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  5. अन्ना अन्ना अन्ना ...
    यूँ तो सभी क्षणिकाएं कमाल की हैं ...

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