मैं बेवजह उलझ पड़ता हूं सबसे
अपने-पराये की पहचान भी नहीं है
अक्सर अपने देते रहते है यह सलाह
कहते हैं छोटी-छोटी बातों को इगनोर करो...
और मैं
‘‘मजा मारे मकईया के खेत में’’
या फिर
‘‘जरा सा जिंस ढीला करो’’
बजते
सुन भड़क जाता हूं
जब वह किसी यात्री बस पर
या फिर
दोस्त के बहन की शादी में
बैठी मां-बहनों को शर्माते हुए देखता हूं।
बगल में बैठ कोई चिलम धराये
या सिगरेट जलाए लोगों पर भी
मैं भड़क जाता हूं।
मैं तब भी भड़क जाता हूं
जब किसी बृद्धा से पेंशन निकालने में
लिया जाता है नजराना
जो होता है उनके लिए
‘‘मात्र दस रूपया...’’
दबे कुचलों की आवाज बनने
चला जाता हूं मीलों दूर
गंदी वस्ती में
जहां मुझे भी लोग उसी तरह घूरते है
जैसे मैं भी आया हूं वोट मांगने
और वर्षो से ठगे जाने वाले लोग
न उम्मीदी में ही सही
सुनाने लगते है अपना दुखड़ा
और कीबोर्ड पर खट खट कर
उनकी आवाज को बना देता हूं आग
तब भी लोग मुझे सलाह देते हैं
तोरा की काम हो?
तोरा की मिलो हो?
की फायदा?
पता नहीं
पर विसमताओं और
विसंगतियों को देख
मुझे गुस्सा बहुत आता है।
















