सोमवार, 16 अप्रैल 2012

लबादा


लबादा ओढ़ कर जीते हुए
सबकुछ हरा हरा दिखता है
बिल्कुल
सावन में अंधें हुए
गदहे की तरह।

लबादे को टांग कर अलगनी पर
जब निकलोगे बनकर
आमआदमी
तब मिलेगी जिंदगी
कहीं स्याह
कहीं सफेद
कहीं लाल
और कहीं कहीं
बेरंग

8 टिप्‍पणियां:

  1. बहुत बढ़िया................
    तीखा कटाक्ष...............................

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  2. मेरी टिप्पणी स्पाम से निकालिए प्लीस...
    दोबारा दाद देती हूँ सार्थक रचना हेतु.

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  3. सही कहा है जनाब.. पर ऐसी सोच रखने वाले हमारे कितने नेता हैं? यह बड़ी ही शोचनीय बात है..

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    1. प्रतीक जी इसमें नेता कहां से आ गया, हम भी तो लबादा ओढ़ कर जीते है?

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  4. बेहद खूबसूरत सोच ......पर आज आम आदमी की सोच भी बदल चुकी हैं ..आभार

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