बुधवार, 15 फ़रवरी 2012

कोकून और आदमी




सतत हरे भरे का ग्रास कर
अपनों के लिए बनाया
एक रेशम का घर....?

कराहती रही
शहतूत की कोमलता
और बना हमारा कोकून....?



फिर अनवरत संधर्ष किया
कोकून से बाहर आने का...



फिर कोई रेशमी धागे का लोभी
डाल देता है कोकून को
खौलते हुए पानी में....


फिर वही कोकून बन जाता है
अपनों के लिए श्मशान....?

रेशम के कीड़े और मुझमें
कितनी समानता है...






















7 टिप्‍पणियां:

  1. रेशम के कीड़े और मुझमें
    कितनी समानता है.... निःशब्द सी प्रकृति और प्रवृति में उलझी हूँ

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  2. दूसरों के लिए मर मिटने का नाम ही ज़िन्दगी है ..
    kalamdaan.blogspot.in

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  3. बेहतरीन सुंदर रचना, अच्छा लेखन ...

    MY NEW POST ...कामयाबी...

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  4. बहुत सुन्दर प्रस्तुति!
    --
    आपकी इस प्रविष्टी की चर्चा आज के चर्चा मंच पर भी की गई है!
    सूचनार्थ!

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  5. बहुत कुछ कहती गहन रचना...
    सादर.

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  6. इस संसार में आने वाले हर प्राणी का कर्म पहले से ही निश्चित ...जो उसे करना पड़ता हैं ...

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