शुक्रवार, 3 जून 2011

जीवन की रेल....


अहले सुबह अलसाये
जब यात्री  अपने वर्थ से
नीचे उतरे तो बिखड़ी गंदगी को देख
नाक मुंह  सिंकोड़ने लगे..

गंदा तो सभी ने किया पर साफ कौन करेगा?

फिर सीख लेते हैं इसी तरह जीना
गंदगी के साथ....

तभी भावशुन्य चेहरे के साथ आता है
वह आदमी
चिथड़ों में लिपटा शरीर
भनभनाती मख्खियां..
और बुहारने लगता है..

तभी एक सज्जन पिच्च से पान की पिरकी
फेंकते हुए कहते हैं
‘‘पागल’’?

गंदगी को फेंक लौटा
वह आदमी..
भावशुन्य चेहरे के साथ
फैला कर  अपना हाथ
खामोशी से देखता रहा
सबको बारी बारी

तभी मैं डर गया
लगा जैसे
वह कह रहा हो
कितने गंदे लोग
कितना गंदा समाज
कितने पागल एक साथ.....

10 टिप्‍पणियां:

  1. antarman tak par chot karti aapki rachna hame hamari hi sachchai se ru-bu-ru kara rahi hai .aabhar .

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  2. कितने गंदे लोग
    कितना गंदा समाज
    कितने पागल एक साथ.....
    sach hi to baat hai.use yahi kahna hi chahiye.

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  3. कितने गंदे लोग
    कितना गंदा समाज
    कितने पागल एक साथ
    क्या बात है बहुत अच्छी बात कही !

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  4. स्तब्ध करती आपकी रचना .... आईना दिखा दिया ....

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  5. हम दूसरों को दोश देने मे तो माहिर हैं। उम्दा रचना। बधाई।

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  6. सच को प्रतिबिम्बित करती बेहतरीन रचना...

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  7. हम सबने देखा है यह दृश्य अनेक बार .मार्मिक ,झिंझोड़ता हुआ ,हैना कितने ज़हीन हैं हम लोग .

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