शुक्रवार, 22 फ़रवरी 2013

गुमराह






















जिंदगी जी जाती है अपने हिसाब है।
गुमराह लोग जीते है नजरे किताब से।।

सोहबत से जान जाओगे फितरत सभी का।
एक दिन झांक ही लेगा चेहरा नक़ाब से।।

शाकी को क्यों ढूढ़ते हो मयखाने में साथी।
रहती है यह संगदिल हसीनों के हिजाब में।।



चित्र गूगल से साभार

11 टिप्‍पणियां:

  1. बहुत खूब क्या बात है आनंद आगया
    मेरी नई रचना

    खुशबू

    प्रेमविरह

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  2. बहुत खूब क्या बात है आनंद आगया
    मेरी नई रचना

    खुशबू

    प्रेमविरह

    उत्तर देंहटाएं
  3. सोहबत से जान जाओगे फितरत सभी का।
    एक दिन झांक ही लेगा चेहरा नक़ाब से।।
    बहुत खूब....
    :-)

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  4. वाह जी क्‍या बात है.बहुत बढ़ि‍या

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  5. सोहबत से जान जाओगे फितरत सभी का।
    एक दिन झांक ही लेगा चेहरा नक़ाब से ..

    बहुत खूब .. सही कहा है ... नकाब उतर ही जाता है एक दिन ...

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  6. आपकी इस प्रविष्टी की चर्चा कल रविवार (24-02-2013) के चर्चा मंच-1165 पर भी होगी. सूचनार्थ

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  7. अति सुन्दर ।
    लेकिन दिल नहीं भरा।

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  8. एक जिंदगी बीत जाती है ...सब कुछ समझ आने में

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  9. बहुत सार्थक प्रस्तुति आपकी अगली पोस्ट का भी हमें इंतजार रहेगा महाशिवरात्रि की हार्दिक शुभकामनाये

    आज की मेरी नई रचना आपके विचारो के इंतजार में
    अर्ज सुनिये

    कृपया आप मेरे ब्लाग कभी अनुसरण करे

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