मंगलवार, 8 जनवरी 2013

बुरा लगता है (पाक के नापाक कदम पर ‘‘साथी’’ का दर्द)


जान कर भी बनते हो अनजान, बुरा लगता है।
फितरत से जुदा हो उनमान, बुरा लगता है।।

यूं तो कातिले-कौम हो तुम।
कहलाते हो इंसान, बुरा लगता है।।

बनकर रकीब पीठ में भोंक दो खंजर।
दोस्त बन कर देते हो यही अंजाम, बुरा लगता है।।

12 टिप्‍पणियां:

  1. यूं तो कातिले-कौम हो तुम।
    कहलाते हो इंसान, बुरा लगता है।।
    सच

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  2. आपकी इस पोस्ट की चर्चा 10-01-2013 के चर्चा मंच पर है
    कृपया पधारें और अपने बहुमूल्य विचारों से अवगत करवाएं

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  3. यूं तो कातिले-कौम हो तुम।
    कहलाते हो इंसान, बुरा लगता है।।
    बहुत अच्छा ..

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  4. सच कहा है ... पीठ पीछे धोखा देते है ये ...
    पर हम भी बुधू बने बैठे हैं ... पता नहीं क्यों ...

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  5. दोस्ती में दगा ...ये ही तो सबसे बुरी बात है

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  6. बनकर रकीब पीठ में भोंक दो खंजर।
    दोस्त बन कर देते हो यही अंजाम, बुरा लगता है।।

    अब इससे ज्यादा क्या कह सकते हैं पता नहीं वो कब समझेंगे.

    शुभकामनायें पोंगल, मकर संक्रांति और माघ बिहू की.

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  7. बहुत खूब ,,,,
    कुछ भी हो, हमारी मातृभूमि की तरफ आँख उठाकर देखने की भी कोई जुर्रत न करे, चाहे वो कोई भी हो ,,,,
    साभार !

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  8. दोस्त बन कर देते हो यही अंजाम, बुरा लगता है..
    ठीक कहा आपने ...
    शुभकामनाएं !

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