रविवार, 11 नवंबर 2012

साथी के बोल बच्चन...


तिस्नगी है साथी तो दरिया का रूख कर।
समुन्द्र की फितरत नहीं होती, प्यास को बुझाना।।

यूं तो अमीरों से सोहबत है तुम्हारी साथी।
दौरे गर्दिश में गरीब दोस्त को भी आजमाना।।

जां देकर भी जो कहीं जिक्र न करे साथी।
दोस्ती का यह सलीका भूल गया है जमाना।।

9 टिप्‍पणियां:

  1. बहुत बढिया । आपको दीपावली की शुभकामनायें

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  2. आपको दिवाली की शुभकामनाएं । आपकी इस खूबसूरत प्रविष्टि की चर्चा कल मंगल वार 13/11/12 को चर्चा मंच पर राजेश कुमारी द्वारा की जायेगी आप का हार्दिक स्वागत है

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  3. जां देकर भी जो कहीं जिक्र न करे साथी।
    दोस्ती का यह सलीका भूल गया है जमाना।।


    सही कहा ...अब दोस्ती का वो ज़माना हैं कहाँ ?????

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  4. तिस्नगी है साथी तो दरिया का रूख कर।
    समुन्द्र की फितरत नहीं होती, प्यास को बुझाना ..

    सच कहा है ... समुन्दर डुबो देते हैं ... प्यास दरिया ही बुझा सकता है ...

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