गुरुवार, 29 मार्च 2012

जीवन का कूड़ेदान














घर की सफाई करते
कूड़े़ को भी
उलट-पुलट
देख लेता हूं
कई बार..
बिना जांचे-परखे
कूड़ेदान में फेंकने का मलाल
रह जाता है
जीवनभर...
शायद कुछ महत्वपुर्ण हो?

जीवन की फिलॉस्फी भी
इसी तरह है
जाने कब, कहां, कैसे
जिसे हमने फेंक दिया
कूड़ा समझ कर
आज भी है उसके फेंके जाने का मलाल
सीने में एक टीस की तरह
शायद वह भी महत्वपुर्ण होता...

10 टिप्‍पणियां:

  1. जल्बाजी और क्रोध में लिए फैसले अकसर गलत होते हैं...

    अच्छी रचना.

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  2. वक्त वक्त की बात है. कभी कभी बेकार वस्तु भी महत्वपूर्ण हो जाती है.

    अच्छी रचना.

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  3. जीवन की फिलॉस्फी भी
    इसी तरह है
    जाने कब, कहां, कैसे
    जिसे हमने फेंक दिया
    कूड़ा समझ कर
    आज भी है उसके फेंके जाने का मलाल
    सीने में एक टीस की तरह
    शायद वह भी महत्वपुर्ण होता... हाँ लगता तो है

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  4. हा गलती से ऐसा भी हो जाता है कभी कभी..
    सुन्दर रचना.....

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  5. बहुत बढ़िया प्रस्तुति!
    घूम-घूमकर देखिए, अपना चर्चा मंच
    लिंक आपका है यहीं, कोई नहीं प्रपंच।।
    आपकी इस प्रविष्टी की चर्चा कल शनिवार के चर्चा मंच पर भी होगी!
    सूचनार्थ!

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  6. बहुत खूबसूरत बात.... वाह!
    सादर।

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  7. बहुत सच कहा है...सुन्दर प्रस्तुति..

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  8. सच कहा है ... अक्सर होता है जीवन में .. समझ नहीं पाते हम किसी को और बाद में पछताते हैं ..

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  9. वाह बहुत खूब ..........जीवन का कड़वा सच सबके सामने रख दिया हैं आपने

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