मंगलवार, 13 जनवरी 2026

अब कहीं आदमी नहीं मरता

अब कहीं आदमी नहीं मरता (अरुण साथी) खंड-खंड होकर पहले हमारी संवेदनाएं मेरी तब उसके बाद अब कहीं कोई आदमी नहीं मरता..
अब, कहीं कोई हिंदू मरता है कहीं कोई मुसलमान मरता है और मरते हैं यहूदी, सिख, ईसाई और बौद्ध बस अब कहीं कोई आदमी नहीं मरता.

रविवार, 16 नवंबर 2025

अहंकार

कविता/अहंकार

मंगलवार, 30 सितंबर 2025

दुर्गापाठ ..

दुर्गापाठ

1
बेटी के जन्म पर जिसका परिवार रोता है,
 उसके घर भी आजकल दुर्गा पाठ होता है!


2
कोख में बेटी को जो मार कर आता है,
सुना है आज उसके घर भी नवराता है!
3
दहेज के लोभ में जो बेटियों को जलाता है,
वह भी अपने घर कन्या पूजन कराता है!
4
देहरी से निकलते ही बेटियों पर जो लांछन लगाता है,
वही समाज दुर्गा पूजा का भव्य स्वांग भी रचाता है!

रविवार, 7 सितंबर 2025

गुस्सा

गुस्सा

गुरुवार, 4 सितंबर 2025

साथी क बकलोल वचन

साथी के बकलोल वचन 
**
जो शिक्षक 
लोगों के द्वारा 
शिक्षकों का सम्मान 
अब नहीं करने की बात 
सबको बताते हैं, 
**
वहीं, 
शिक्षक दिवस पर 
केक काट 
"चुम्मा मांगे मस्टरवा"
गाना पर 
बच्चों संग ठुमके लगाते हैं...

मन

मन 
**
कभी-कभी
पढ़ते-पढ़ते
लिखने लगता हूँ,

और कभी-कभी
लिखते-लिखते
पढ़ने लगता हूँ।
अजीब हूँ मैं भी,
करना क्या होता है,
और करने क्या लगता हूँ।

सोमवार, 1 सितंबर 2025

प्रेम और अप्रेम

प्रेम और अप्रेम

पूरी दुनिया
आसमाँ भर प्रेम
माँग रही है,
और इधर,
कोई बस चुटकी भर
प्रेम बाँट रहा है…

आज राह चलते मिले प्रेम की एक तस्वीर

शनिवार, 2 अगस्त 2025

थूक दिया

थूक दिया  

उसने सीना चौड़ा किया,
सिर उठाया,
और आकाश की ओर
आँखें तरेर कर देखा।
फिर... थूक दिया।
अगले ही पल
वह अपने ही चेहरे से
अपना थूका
साफ कर रहा था।
बस। 



शनिवार, 26 जुलाई 2025

प्रेम और परछाई

 प्रेम और परछाई
अरुण साथी


उसने कहा —
अब घटता जा रहा है
तुम्हारा प्रेम,

वैसे ही जैसे
दोपहरी को बढ़ाते सूरज के
साथ-साथ घटती जाती है
परछाई।

मैंने कहा —
तपती दोपहरी में
देह और परछाई का
एकाकार ही तो प्रेम है...
बस।
 प्रेम और परछाई
अरुण साथी

उसने कहा —
अब घटता जा रहा है
तुम्हारा प्रेम,

वैसे ही जैसे
दोपहरी को बढ़ाते सूरज के
साथ-साथ घटती जाती है
परछाई।

मैंने कहा —
तपती दोपहरी में
देह और परछाई का
एकाकार ही तो प्रेम है...
बस।

सोमवार, 9 जून 2025

कब्र में आदमी

कब्र में आदमी

ज़िंदगी की खोई धड़कनों की तलाश
अचानक ही बैठे-बैठे मन के किसी 
चुप कोने से एक हूक उठी


कितने दिन हो गए... 
कोई कविता नहीं लिखी, 
ना रंगों से कोई चित्र रचा। 

ग़ज़ल की कोई धीमी सरगम 
कानों तक नहीं आई, 
किसी सिनेमा में खुद को खोया नहीं।


कई दिनों से बिना वजह 
कुछ गुनगुनाया नहीं, 
आईने में झांककर मुस्कुराया भी नहीं।


ना किसी जिगरी को छेड़ा हौले से, 
ना किसी उदास चेहरे को हंसाया अपने ढंग से।

किसी अच्छी किताब के पन्नों में डूबा भी नहीं, 
उसे पढ़ते-पढ़ते जम्हाई भी नहीं ली,
ऐसा भी अरसा बीत गया।

किसी उड़ती चिड़ी को या 
किसी मुस्कुराते फूल को 
कैमरे में कैद भी तो नहीं किया...

जीवन को बस ढोते रहे हैं... 
जीते नहीं..

चलते रहे हैं यूं ही, 
जैसे कोई आदमी कब्र में चल रहा हो
धीरे, चुपचाप, बिना धड़कन, बिना मक़सद.

सोमवार, 27 जनवरी 2025

पाप–पुण्य

पाप पुण्य 

(अरुण साथी)

गंगा में डुबकी लगा 

नहीं चाहता हूं धो लेना 

अपने हिस्से के पाप को


बजा के घंटी, लगा के टीका 

कम भी नहीं करना चाहता हूं उसे


चाहता हूं अपने हिस्से का पाप 

वैसे ही अपने पास रहे 

जैसे रहता है पुण्य 


फिर चाहता हूं 

चुटकी चुटकी 

पुण्य को जोड़ता रहूं 


और चाहता हूं, अंत में जब 

हिसाब किताब हो तो 

अपने पुण्य का पलड़ा

एक छटांक से ही सही 

भारी हो जाए, बस...

बुधवार, 28 अगस्त 2024

मैं भी तो खबर बनूंगा

मैं भी तो खबर बनूंगा 
--
सोचता हूं 
खबरों को जीते-जीते 
किसी दिन अचानक से 
मैं भी तो खबर बनूंगा


कुछ अपने शोक संवेदना में 
कुछ शब्द लिखेंगे 
कुछ नमन, विनम्र श्रद्धांजलि
लिखकर अपनी 
औपचारिकता पूर्ण करेंगे 

कुछ अपने रो-धो लेंगे 
कुछ दिन 
 
सोचता हूं 
क्या कोई मेरे लिए उदास होगा 

कोई मुझे, मेरे बाद 
मुझे याद करेगा

कोई मुझे, मेरे बाद भी 
प्यार करेगा 

फिर सोचता हूं 
किसी के लिए 
आज तक तो
ऐसा हुआ नहीं है  
तब 

 तस्वीर व्हाट्सएप एआई ने दिए गए निर्देश पर बनाकर दिया है
--
सोचता हूं 
खबरों को जीते-जीते 
किसी दिन अचानक से 
मैं भी तो खबर बनूंगा

कुछ अपने शोक संवेदना में 
कुछ शब्द लिखेंगे 
कुछ नमन, विनम्र श्रद्धांजलि
लिखकर अपनी 
औपचारिकता पूर्ण करेंगे 

कुछ अपने रो-धो लेंगे 
कुछ दिन 
 
सोचता हूं 
क्या कोई मेरे लिए उदास होगा 

कोई मुझे, मेरे बाद 
याद करेगा

कोई मुझे, मेरे बाद भी 
प्यार करेगा 

फिर सोचता हूं 
किसी के लिए 
आज तक तो
ऐसा हुआ नहीं है  
तब 

 तस्वीर व्हाट्सएप एआई ने दिए गए निर्देश पर बनाकर दिया है

रविवार, 21 जुलाई 2024

बधिया

बधिया 
(अरुण साथी)

जनतंत्र के राजा के लिए 
बहुत आवश्यक है कि 
वह जो बोलते हैं
देश भी वही बोले 

आवश्यक यह भी है कि 
वह जो नहीं बोलते हैं 
देश वह भी बोले 

यह तो और भी आवश्यक है कि 
वह जब बोलने नहीं कहें 
तब कोई कुछ भी नहीं बोले 
सब रहे चुप, एकदम चुप 

अब इस प्रकार की 
शांति व्यवस्था के लिए 
बहुत आवश्यक है कि 

जाति 
धर्म 
विचारधारा के औजार से 
आदमी का बधिया कर दिया जाए 
बस

(नोट-वर्तमान राजनीति से इसका कोई संबंध नहीं है।)

शुक्रवार, 19 जुलाई 2024

देह

देह 

शनिवार, 29 जून 2024

अहं ब्रह्मास्मि

अहं ब्रह्मास्मि  

(अरुण साथी )

वह देवता पुत्र था 
उसने तपस्या की 
घनघोर 
उसने सारी विद्या सीखी 


उसे वरदान मिला 
अमरत्व का
उसने स्वर्ण महल बसाया 
स्वर्ग में सीढ़ी लगाने की
घोषणा की 

उसने मन की गति से
पुष्पक विमान उड़ाए

उसने युग जीता 
उसने देवता को 
दास बना लिया 
उसने काल को भी 
बस में कर लिया 
फिर उसने घोषणा 

अहं ब्रह्मास्मि

और तब वह रावण हो गया


शुक्रवार, 29 मार्च 2024

प्रेम की कविता


#प्रेम की #कविता
(अरुण साथी)
वह रोज मिल जाती है
कभी बीच सड़क
कभी गली में
कभी छत पे
कभी झरोखे से

कभी कभी
मिल जाती है
सपनों में भी

नज़रें मिलते ही
वह आहिस्ते से
मुस्कराती है

फिर नजरे झुका
चली जाती है
बस...


शुक्रवार, 1 मार्च 2024

आदमी, कुत्ता और कचरा

आदमी, कुत्ता और कचरा
कचरे का बड़ा ढेर
कचरे के ढेर को 
आदमी ने बड़े ही जतन से 
संग्रहित किया 
बरसों की मेहनत 
एक-एक कचरा से 
खड़ा किया साम्राज्य 
कचरे का 

और घोषित किया 
स्वयं को राजा 

हम ऐसे आदमी को 
विक्षिप्त कहते हैं 

और आश्चर्य तो यह कि 
वह भी हमें यही समझता है...

शेखपुरा रेलवे स्टेशन के पास इस तस्वीर को कैद करने के बाद मेरे शब्द..

शनिवार, 20 जनवरी 2024

राम ने कहा

राम ने कहा

सुनो वत्स

मुझे मर्यादा पुरुषोत्तम 

जानते है सब 

मुझे मर्यादा में ही रहने दो


बाल्मिकी और तुलसी

की भावनाओं के साथ ही मुझे 

जन जन के जीवन में बहने दो


मर्यादा टूटी तो 

मुझे कौन पुरुषोत्तम मानेगा


फिर 

रावण को भी गुणी मान

कौन अपने भ्राता

को उसके चरणों  में भेज

जीवन का सूत्र  जानेगा...


मुझे दिव्य दिगंबर

बना दोगे तो

सबरी के जूठे 

बेर कौन खायेगा


केवट की नाव चढ़

कौन उस पार जायेगा


फिर माता अहिल्या

शिला ही रहेगी

इस तरह फिर

कौन उद्धारक आयेगा


मुझे तो जटायु

हनुमान, बानर

के साथ ही रहने दो


स्वर्ण महलों के मुझे बिठाओगे

तो भला  रावण वह,

जिसकी सोने की लंका थी

किसी को कैसे बताओगे


रावण वह

जिसने साधु के भेष

में सीता हरण किया

किसी को कैसे समझाओगे


सुनो वत्स..सुन लो..



बुधवार, 8 नवंबर 2023

धान और किसान

धान और किसान 

अरुण साथी

तुमने जहर बोया
हमने धान बोया
तुम बारुद उगाओ
हम धान उगाएगें



तुम धृणा बांटो
हम धान बांटेगें
तुम भूख दोगे
हम धान देगें



तुम आश्वासन दोगे
हम धान देगें
तुम नेता हो
हम किसान हैं

(तस्वीर और शब्द दोनों अरुण साथी )

रविवार, 22 अक्टूबर 2023

सुनो स्त्री

#सुनो_स्त्री
#दुर्गा पूजा पंडालों में
बजते घंटे, घड़ियाल
आरती की गूंज
धूप, दीप, नौवेद्य
अछत, अलता
नौ दिन उपवास
हवन, दुर्गा पाठ
कन्या पूजन
से तुमको यदि
स्त्री को पूजे जाने
का गुमान हो
तो तुम गुमान
मत करना..

छद्मवादी समाज में
हम तुमको नहीं,
तुम्हारी मूर्ति 
को पूजते है...


पूजा वाले हाथ ही
तुम्हारे देह भी नोंचते है..


तभी तो
तुम्हारे लिए
सपने भी 
हम ही बुनते है..



और
तभी तो
हम तुमसे

तुम्हारा स्वाभिमान
स्वबोध, स्वतंत्रता
सब छीनते है...