बुधवार, 30 मार्च 2016

मैं जागो मांझी बोल रहा हूँ, हाँ मैं भूख से नहीं मरा..

मैं जागो मांझी बोल रहा हूँ, हाँ मैं भूख से नहीं मरा..

(अरुण साथी)

हाँ मैं जागो मांझी ही बोल रहा हूँ
गलत है कि मैं मर गया हूँ
मैं मर कैसे सकता हूँ
मैं तो बोल ही रहा हूँ
कि मैं भूखा हूँ
मुझे रोटी दो
पर सुनेगा कौन?
इस कब्रिस्तान में?

समूचा शहर ये कब्रिस्तान है
जिसमे रहते है साँस लेते
चलते, बोलते लोग

और इसी कब्रिस्तान का राजा
को मेरे भूखे होने की आवाज
नागवार लगी है
इसी लिए उन्होंने
मेरे शारीर को
चिड़फाड़ कर
यह साबित किया
कि मैं भूखा नहीं हूँ

हे महाराज
मैं अकेला नहीं
बोल रहा हूँ
लाखों है बोलने वाले
कि मुझको ही मेरे हिस्से का
राशन नहीं मिलता,

हे महाराज
मेरे जैसों की क्रंदन को
सुनो तो,

और सुनो तो
कि मरने के बाद भी
जागो मांझी क्या बोल रहा है..

हाँ मैं भूख से नहीं मरा,
मैं तो मरा हूँ
इस व्यवस्था कि
अकर्मण्यता से
निर्लज्जता से
संवेदनहीनता से

मैं तो मरा हूँ
छीन लिए गए
मेरे हिस्से के
उन
निवाले कि वजह से
जो
नोटों की शक्ल में
तुम्हरी तिजोरी में बंद है

सुनो तो सही
मैं जागो मांझी बोल रहा हूँ...

(भूख से मरे जागो मांझी की खबर करने के बाद)

2 टिप्‍पणियां:

  1. बेहतरीन लिखा सामयिक , नक्कारखाने मे तूती की आवाज़, मगर है

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  2. आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल शुक्रवार (01-04-2016) को "भारत माता की जय बोलो" (चर्चा अंक-2299) पर भी होगी।
    --
    सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
    --
    चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
    जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
    --
    मूर्ख दिवस की
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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