शनिवार, 8 नवंबर 2014

बेवफाई

शाम ढलते ही याद आती है वो।
बिछड़ के भी कितना सताती है वो।।
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वो भी एक दौर था, हर शाम उनके नाम थी।
आज भी यूं शाम अपने नाम करवाती है वो।।
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चाहत को न पाने का मलाल आज भी है मुझे।
मेरी इस चाहत पे गुरूर क्यूं न कर पाती है वो।।
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वो बेवफा नहीं है, इतना तो एतवार है मुझको।
फिर सरे महफिल बेवफाई क्यूं जताती है वो।।
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4 टिप्‍पणियां:

  1. सुन्दर रचना !
    मेरे ब्लॉग पर आपका स्वागत है

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  2. बहुत सुन्दर प्रस्तुति।
    --
    आपकी इस प्रविष्टि् की चर्चा कल सोमवार (10-11-2014) को "नौ नवंबर और वर्षगाँठ" (चर्चा मंच-1793) पर भी होगी।
    --
    चर्चा मंच के सभी पाठकों को
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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