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सोमवार, 27 जनवरी 2025

पाप–पुण्य

पाप पुण्य 

(अरुण साथी)

गंगा में डुबकी लगा 

नहीं चाहता हूं धो लेना 

अपने हिस्से के पाप को


बजा के घंटी, लगा के टीका 

कम भी नहीं करना चाहता हूं उसे


चाहता हूं अपने हिस्से का पाप 

वैसे ही अपने पास रहे 

जैसे रहता है पुण्य 


फिर चाहता हूं 

चुटकी चुटकी 

पुण्य को जोड़ता रहूं 


और चाहता हूं, अंत में जब 

हिसाब किताब हो तो 

अपने पुण्य का पलड़ा

एक छटांक से ही सही 

भारी हो जाए, बस...

शुक्रवार, 1 मार्च 2024

आदमी, कुत्ता और कचरा

आदमी, कुत्ता और कचरा
कचरे का बड़ा ढेर
कचरे के ढेर को 
आदमी ने बड़े ही जतन से 
संग्रहित किया 
बरसों की मेहनत 
एक-एक कचरा से 
खड़ा किया साम्राज्य 
कचरे का 

और घोषित किया 
स्वयं को राजा 

हम ऐसे आदमी को 
विक्षिप्त कहते हैं 

और आश्चर्य तो यह कि 
वह भी हमें यही समझता है...

शेखपुरा रेलवे स्टेशन के पास इस तस्वीर को कैद करने के बाद मेरे शब्द..

रविवार, 22 अक्टूबर 2023

सुनो स्त्री

#सुनो_स्त्री
#दुर्गा पूजा पंडालों में
बजते घंटे, घड़ियाल
आरती की गूंज
धूप, दीप, नौवेद्य
अछत, अलता
नौ दिन उपवास
हवन, दुर्गा पाठ
कन्या पूजन
से तुमको यदि
स्त्री को पूजे जाने
का गुमान हो
तो तुम गुमान
मत करना..

छद्मवादी समाज में
हम तुमको नहीं,
तुम्हारी मूर्ति 
को पूजते है...


पूजा वाले हाथ ही
तुम्हारे देह भी नोंचते है..


तभी तो
तुम्हारे लिए
सपने भी 
हम ही बुनते है..



और
तभी तो
हम तुमसे

तुम्हारा स्वाभिमान
स्वबोध, स्वतंत्रता
सब छीनते है...








रविवार, 8 जनवरी 2023

ठोकर

ठोकर

1
वह जा रहा था
सामान्य गति से
अचानक से 
रास्ते में ठोकर लगी 
वह गिर गया 
वह चोटिल हुआ
पैर में जख्म लगे
रक्त बहा
आंसू बहे
आसपास के लोग 
सहानुभूति में देखने लगे 
एक-दो ने मदद में हाथ
भी बढ़ाया 

2

वह आहिस्ते से मुस्कुराया
कपड़े से धूल-गर्दा
साफ किया
फिर उठ खड़ा हुआ 
और चलने लगा 

वह एक बच्चा था..

रविवार, 10 जुलाई 2022

अजीब आदमी

अजीब आदमी 

है वह भी 

आदमी के बीच 

रहता है 



और 

सांपों से 

डरता है....

शनिवार, 25 दिसंबर 2021

शैतान की उदासी

शैतान की उदासी
(अरुण साथी)
1
उन्होंने कहा 
शैतान हो तुम 
आदमखोर
रक्तपिपासु

धर्म के नाम पर 
बंदे का कत्लेआम 
हैवानियत है
तुम्हारा काम

इंसानियत ने उसे 
हैवान-हैवान 
शैतान-शैतान 
पुकारा
शैतान उदास हो गया....

2
अब वे उसी के
जैसे हो गए
वे कहते हैं 
तुम शैतान 
मैं भी शैतान 
तुम हैवान 
मैं भी हैवान
अब शैतान प्रसन्न हो गया...







बुधवार, 19 अप्रैल 2017

अफ़ीम

अफ़ीम
**
भूख
गरीबी
बेरोजगारी
अशिक्षा
से बिलखते
माँ भारती के बच्चों को
वे बड़ी आसानी से सुला देते है,
**
ये राजनेता
जागने से पहले ही
बच्चों को फिर से
धर्म की अफ़ीम चटा देते है..
@arunsathi

शनिवार, 31 दिसंबर 2016

महुआ महके..

महुआ महके तोर अंगना में,
सूरजमुखी खिल जाये।
बेला, जूही, हरसिंगार सन,
जीवन खुशबु  से भर जाये।।

सरसों फूलो, मांजर महके,
धान, गेहुम लहराये।
केतारी सन रसगर हो जीवन,
मटर, मकई नियर गदराये।।

कोयल कूके, बुलबुल गाये,
तोता, मैना शोर मचाये।
आये गोरैया, पानी पिए,
अंगना में, धप्चुहिया मुस्काये।।

चुमनुमिया चिरैया शोर मचाये,
कागा आके भोर जगाये।
खिले गुलाब, गेंदा गोदी में,
कहे "साथी" बथान में गोरु-गाय डोंराय।।

*नव बर्ष की मंगलकामनाएं..*
अरुण साथी, पत्रकार, बरबीघा, (बिहार)

मंगलवार, 12 जुलाई 2016

छिछियैनी दुर्गन्ध

छिछियैनी दुर्गन्ध 

(अरुण साथी)


बोन चाइना की

कशीदाकारी प्लेट में

जब गोश्त का टुकड़ा डाला

तो अजीब सी छिछियैनी

दुर्गन्ध आई...


पांच सितारा भव्यता

लेज़र लाइटिंग की चकाचौंध

ह्रदय गति को

स्तंभित करती

डीजे की धूम-धड़ाक में भी

यह छिछियैनी सी दुर्गन्ध

जानी पहचानी सी लगी..


ओह,

यह तो वही छिछियैनी सी दुर्गन्ध है

जो आज ही अस्पताल में पड़ी

दहेज़ के लिए जली 

एक बेटी की

देह से आ रही थी..


ओह, ओह, ओह

शुक्रवार, 31 अक्टूबर 2014

धुंआ उठता है..



आंसू मेरे बहे 
भींगे उनके नयन
दर्द मुझकों मिला 
सजी उनकी गजल

न चिंगारी उठी
न आग लगी
फिर भी
जलन है
तपन है
और धुंआ भी उठता है

देखिए
बड़ी नफाशत से
साथी के जिंदगी का
शहर जलता है......

मंगलवार, 25 फ़रवरी 2014

इश्कतारी है.....


जबसे साथी पे इश्कतारी है।
हर पल उनकी खुमारी है।।

आँखों में फुल सा चेहरा।
दिल में खिली फुलबाड़ी है।।

होठों पे है हंसी हरदम।
ये कैसी लगी बीमारी है।।

जुस्तजू सी है हर सू उनका।
फिर भी मिलन में दुश्वारी है।।

हर शय में अक्स उनका है।
इश्क की ये कैसी बेकरारी है।।




(मेरे द्वारा खिची गयी एक बंजारन की तस्वीर) 

गुरुवार, 16 जनवरी 2014

नाप देता है आदमी



नाप देता है आदमी
जरा सा हंस-बोल 
क्या लिया
नाप देता है आदमी
औरत का पूरा देह
वामन की तरह...

औरत की देह
की चौहद्दी
उसकी गोलाई
से लेकर
चौड़ाई तक
सब कुछ
एक नजर में...

नहीं नाप पाता है
आदमी
ताउम्र
औरत की गहराई...

शनिवार, 21 दिसंबर 2013

गिद्ध

आज कल घरती पर गिद्ध
हर जगह रहते है..

आज ही तो
आइसक्रीम बेच रहे नन्हें चुहवा पर
चलाया था चान्गुर
गाल पर पंजे का निशान उग आये
बक्क!
आंखों में भर आया
लाल लहू ...

कल ही रेलगाड़ी में भुंजा बेच रहे मल्हूआ पर
खाकी गिद्ध ने मारा झपट्टा
बचने के प्रयास में आ गया वह पहिये के नीचे
सैकड़ों हिस्सों में बंट गया मल्हूआ..

गिद्धों के हिस्से आया एक एक टुकड़ा..

अब तो हर जगह दिखाई देते है गिद्ध

कहीं भगवा, कहीं सेकुलर
तो कहीं जेहादी बन कर
टांग देते है कथित धर्म की धोती
अपने ही बहन-.बेटी के माथे पर
और फिर नोच लेते है उसकी देह
भूखे गिद्धों की तरह...

गांव से लेकर शहर तक पाये जाते है
गिद्ध....

सोमवार, 15 जुलाई 2013

भूख, बिल्ली और नेता..


अब कलावती के घर 
बिल्ली भी नहीं आती
समझती है वह 
कई दिनों से खामोश चुल्हे 
और भूख से बिलखते बच्चों का दर्द

पर हे जनतंत्र के कर्णधारों
इतनी छोटी से बात 
तुम क्यों नहीं समझते?

क्यों रोटी की जगह 
धर्म का अफीम देकर
सुला देना चाहते हो हमें
भूखे पेट 
बारबार, लगातार....


शुक्रवार, 3 मई 2013

घृणा



उस दिन
कथित अधार्मिक 
मठाधीश को
अपदस्त कर 
गांव में जश्न मना
तो मैं भी बहुत खुश हुआ....

चलकर देखने गया
अपनी खुशी

नये मठाधीश
पुर्व में लिखे नाम वाले
शिलापट्टों को तोड़ रहे थे....

पता नहीं क्यों?
इस घृणा को देख
मैं फिर उदास हो गया.....



शुक्रवार, 4 नवंबर 2011

अन्तराल















अन्तराल..
दर्द और हंसी के बीच..

जो जुड़ा था
उसके टूटने से पहले,
होता है एक अन्तराल।

टूटना नये का आगमन है..
पूष की रात
और फिर
वसंत,
बीच का अन्तराल
पतझड!

ढूंठ था जहां कभी
वहां कलरव करते है विहग
वसंत
पतझड़
और अंतराल
जीवन का सबसे बड़ा सवाल....

शुक्रवार, 7 अक्टूबर 2011

कालकंट



















बचपन से बुढ़ापे तक,
गांव की गलियों से
महानगरों की अट्टालिकाओं तक,
जीवन के आदि से अंत तक..
रोज-रोज
क्षण-क्षण
विषवमन करते हैं वे
और मैं
अभ्यस्त हो गया हूं
विष पीने का।

कहीं कोई जाति और धर्म के नाम पर,
कहीं कोई मजूर जानकर,
उगलते रहते हैं
सांधातिक विष।

सदियों से पीते हुए विष को,
काला पड़ गया देह,

और एक प्याला पीकर
नीलकंठ-हो गए भगवान

मैं आज भी कालकंट के कालकंट ही रहा।

मंगलवार, 13 सितंबर 2011

दोस्ती.



कभी कभी मैं भी झेंप जाता हूं,
जब, मित्र के पत्तल से
उठा कर मिठाई
अपने पत्तल में डाल लेता हूं
और लोग चौक कर अचरज से 
मेरी ओर देखने लगते हैं।

तब, जब मित्र अपने हिस्से की 
आधी से अधिक चाय
मेरे कप में उड़ेल देते हैं

और तब भी,
जब कभी कभी
मित्र संकोचवश 
खाने लगते है मिठाई
और मैं छीन लेता हूँ 
झप्पटा मार कर...

लोग मेरी अशिष्टता पर हंसते हैं।

परवाह नहीं, लोग क्या सोंचते होगें...

पर एक डायबिटिक मित्र की मिठासा छीनना
मुझे सौ जन्मों की खुशी दे जाती है....

सोमवार, 27 जून 2011

जी रहे है हम मुर्दों की तरह....


जी रहे है हम मुर्दों की तरह....

मरा हुआ सांप देख हिम्मत वढ़ जाती है,
पहले उसका मुंह थुरते है, जहां होता है विषैला दांत।
और
चाहते है पक्का करना उसकी मृत्यु
जीवित होने के सभी संभावनाओं की हद तक
पक्का....

लगाते है दो चार इंटा और उपर से...

है तो यह विषधर
पर उन्हें यकीन है यह मरा हुआ है।

तभी तो
रामलीला हो
या जन्तर मंतर

घर का चुल्हा उपास हो
या
लगी हो जोर की प्यास
हम उफ नहीं करते....


तभी तो
इसी की पूंछ पकड़
डराते है
अन्ना
और
रामदेव को
भागो
भागो...

न कोई हलचल
न कोई स्पंदन
जी रहे है हम
मुर्दों की तरह....

शुक्रवार, 3 जून 2011

जीवन की रेल....


अहले सुबह अलसाये
जब यात्री  अपने वर्थ से
नीचे उतरे तो बिखड़ी गंदगी को देख
नाक मुंह  सिंकोड़ने लगे..

गंदा तो सभी ने किया पर साफ कौन करेगा?

फिर सीख लेते हैं इसी तरह जीना
गंदगी के साथ....

तभी भावशुन्य चेहरे के साथ आता है
वह आदमी
चिथड़ों में लिपटा शरीर
भनभनाती मख्खियां..
और बुहारने लगता है..

तभी एक सज्जन पिच्च से पान की पिरकी
फेंकते हुए कहते हैं
‘‘पागल’’?

गंदगी को फेंक लौटा
वह आदमी..
भावशुन्य चेहरे के साथ
फैला कर  अपना हाथ
खामोशी से देखता रहा
सबको बारी बारी

तभी मैं डर गया
लगा जैसे
वह कह रहा हो
कितने गंदे लोग
कितना गंदा समाज
कितने पागल एक साथ.....