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मंगलवार, 13 जनवरी 2026
अब कहीं आदमी नहीं मरता
अब कहीं आदमी नहीं मरता
(अरुण साथी)
खंड-खंड होकर पहले
हमारी संवेदनाएं मेरी
तब उसके बाद अब
कहीं कोई आदमी नहीं मरता..
अब,
कहीं कोई हिंदू मरता है
कहीं कोई मुसलमान मरता है
और मरते हैं
यहूदी, सिख, ईसाई और बौद्ध
बस अब
कहीं कोई आदमी नहीं मरता.
मंगलवार, 30 सितंबर 2025
दुर्गापाठ ..
दुर्गापाठ
1
बेटी के जन्म पर जिसका परिवार रोता है,
उसके घर भी आजकल दुर्गा पाठ होता है!
2
कोख में बेटी को जो मार कर आता है,
सुना है आज उसके घर भी नवराता है!
3
दहेज के लोभ में जो बेटियों को जलाता है,
वह भी अपने घर कन्या पूजन कराता है!
4
देहरी से निकलते ही बेटियों पर जो लांछन लगाता है,
वही समाज दुर्गा पूजा का भव्य स्वांग भी रचाता है!
लेबल:
(काव्य),
Arun sathi,
devi durga,
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navratra
शनिवार, 2 अगस्त 2025
थूक दिया
थूक दिया
उसने सीना चौड़ा किया,
सिर उठाया,
और आकाश की ओर
फिर... थूक दिया।
अगले ही पल
वह अपने ही चेहरे से
अपना थूका
साफ कर रहा था।
बस।
शनिवार, 26 जुलाई 2025
प्रेम और परछाई
प्रेम और परछाई
अरुण साथी
उसने कहा —
अब घटता जा रहा है
तुम्हारा प्रेम,
वैसे ही जैसे
दोपहरी को बढ़ाते सूरज के
साथ-साथ घटती जाती है
परछाई।
मैंने कहा —
तपती दोपहरी में
देह और परछाई का
एकाकार ही तो प्रेम है...
बस।
प्रेम और परछाईअरुण साथी
उसने कहा —
अब घटता जा रहा है
तुम्हारा प्रेम,
वैसे ही जैसे
दोपहरी को बढ़ाते सूरज के
साथ-साथ घटती जाती है
परछाई।
मैंने कहा —
तपती दोपहरी में
देह और परछाई का
एकाकार ही तो प्रेम है...
बस।
रविवार, 21 जुलाई 2024
बधिया
बधिया
(अरुण साथी)
जनतंत्र के राजा के लिए
बहुत आवश्यक है कि
वह जो बोलते हैं
देश भी वही बोले
आवश्यक यह भी है कि
वह जो नहीं बोलते हैं
देश वह भी बोले
यह तो और भी आवश्यक है कि
वह जब बोलने नहीं कहें
तब कोई कुछ भी नहीं बोले
सब रहे चुप, एकदम चुप
अब इस प्रकार की
शांति व्यवस्था के लिए
बहुत आवश्यक है कि
जाति
धर्म
विचारधारा के औजार से
आदमी का बधिया कर दिया जाए
बस
(नोट-वर्तमान राजनीति से इसका कोई संबंध नहीं है।)
शनिवार, 29 जून 2024
अहं ब्रह्मास्मि
अहं ब्रह्मास्मि
(अरुण साथी )
वह देवता पुत्र था
उसने तपस्या की
घनघोर
उसने सारी विद्या सीखी
उसे वरदान मिला
अमरत्व का
उसने स्वर्ण महल बसाया
स्वर्ग में सीढ़ी लगाने की
घोषणा की
उसने मन की गति से
पुष्पक विमान उड़ाए
उसने युग जीता
उसने देवता को
दास बना लिया
उसने काल को भी
बस में कर लिया
फिर उसने घोषणा
अहं ब्रह्मास्मि
और तब वह रावण हो गया
बुधवार, 8 नवंबर 2023
शुक्रवार, 18 अगस्त 2023
वह भी आदमी ही है
वह भी आदमी ही हैअरुण साथीहम जहां है, वहीं से हीहमे नीचे देख लेना चाहिएइसलिए नहीं है कियह कोई अनिवार्य शर्त हैबल्कि इसलिए कीनीचे देख लेने भर से हीहमे ठोकर लगने की संभावनाकम हो जाती हैऔर इसलिए भी कीनीचे देखने भर से हीहम देख पाते हैबगैर नीचे देख करचलनेवालें चोटिल हुएआदमी को...और इसलिए भी किजब हम, जहां हैंवहां से नीचे देखते हैंतो सिर्फ अपनी आंखों से हीनहीं देखना चाहिएहमें अपनीसंवेदनाओं में उतर करभी देख लेना चाहिए..और इस तरहदेखने पर ही दिखेगाकि मंदिरों के बाहरएक रोटी के लिएतरसता आदमी जैसा एक भिक्षुक भी आदमी ही हैतब कहीं दिखेगाकि बगैर हाथ-पैर कालोथड़ा जैसा दिखने वालावह आदमी भीआदमी ही हैऔर दिखेगा यह भी किहाड़तोड़ मेहनत करतावह मजदूर जैसा आदमी भीएक आदमी ही हैऔर तब हमछोड़ देगेंईश्वर से हर बात को लेकरशिकायत करना...
लेबल:
(काव्य),
अजीब आदमी,
आदमी,
काव्य संग्रह,
kavita
सोमवार, 12 जून 2023
मौत से निदंद
जाने क्यों
अब मरने से
डर लगता है
पर जब भी
डरता हूँ
तब
कई तर्क वितर्क
मन को
मथने लगतें है
एक मन कहता है
जिसकी मौत
सुनिश्चित नहीं
उसे कौन
मार सकता है
दूसरा कहता है
जिसकी मौत
सुनिश्चित है
उसे कौन
बचा सकता है..
और बस
मैं, निदंद हो जाता हूं..
लेबल:
(काव्य),
hundi kavita,
kavita,
maut se dar
रविवार, 10 जुलाई 2022
रविवार, 23 अगस्त 2015
शनिवार, 1 फ़रवरी 2014
वह मुझकों भी काफिर कहने लगा है..
अब कोई क्यों मुझसे खफा हो।
मैं खुद से ही खफा रहने लगा हूं।।
गैरों से अब शिकवा कैसा।
अपनों का तंज सहने लगा हूं।।
चापलूसों के दौर में सच बोल न दूं कहीं।
इसलिए मैं अक्सर चुप रहने लगा हूं।।
कहता हूं गर मोहब्बत ही है खुदा का मजहब।
वह मुझकों भी काफिर कहने लगा है।।
मैं खुद से ही खफा रहने लगा हूं।।
गैरों से अब शिकवा कैसा।
अपनों का तंज सहने लगा हूं।।
चापलूसों के दौर में सच बोल न दूं कहीं।
इसलिए मैं अक्सर चुप रहने लगा हूं।।
कहता हूं गर मोहब्बत ही है खुदा का मजहब।
वह मुझकों भी काफिर कहने लगा है।।
गुरुवार, 16 जनवरी 2014
शुक्रवार, 6 सितंबर 2013
लैंपपोस्ट
तुफानों की घिरी जिंदगी
डूबती-उतरती रहती है..
कभी सतह पर
तलाशती है कोई
तिनका..
कभी
तलाशती है उसे
जो खोया ही नहीं...
कभी भरकर
मुठ्ठी में रेत
मचल जाती है...
कभी तलाशती है
स्याह
रातों की
सलवटें..
तभी दूर कहीं एक
लैंपपोस्ट
कहती हो जैसे
तुम भी क्यों ने बन जाते हो
मेरी तरह
.
थरथराती हुई सी सही
मेरी रौशनी किसी को
राह तो दिखाती है..
किसी को किनारा तो
बताती है...
डूबती-उतरती रहती है..
कभी सतह पर
तलाशती है कोई
तिनका..
कभी
तलाशती है उसे
जो खोया ही नहीं...
कभी भरकर
मुठ्ठी में रेत
मचल जाती है...
कभी तलाशती है
स्याह
रातों की
सलवटें..
तभी दूर कहीं एक
लैंपपोस्ट
कहती हो जैसे
तुम भी क्यों ने बन जाते हो
मेरी तरह
.
थरथराती हुई सी सही
मेरी रौशनी किसी को
राह तो दिखाती है..
किसी को किनारा तो
बताती है...
शनिवार, 16 मार्च 2013
शिखर.....(काव्य)
शिखर पर पहुंचना बहुत मुश्किल नहीं है।
साहस
धैर्य
निरन्तर प्रयास
और जुनून हो
तो हर कोई पहुंच सकता है..
मुश्किल है शिखर पर टिक पाना !
अहं
घृणा
विवेक शून्यता की पराकष्ठा से
गिर पड़ता है
शिखर पर पहुंचा हुआ
``आदमी´´
और टूट का बिखर जाता है.....
शनिवार, 13 अक्टूबर 2012
शनिवार, 26 मई 2012
देवता के होने पर सवाल उठाता राहू-केतू
कई बार जिंदगी को जीते हुए खामोशी से बिष पीना पड़ता है, कहीं कोई धन का तो कहीं कोई विद्वता का विष वमन कर देता है। मन में एक टीस सी उठती है और फिर कलम से कविता निकल पड़ती है। कहीं कहीं देवता साबित करने के लिए लोग क्या क्या नहीं करते, अपनी बुराईओं को भूल आप पर सवाल खड़े करते है, मैं आज देवता के होने पर ही सवाल खड़ा कर रहा हूं. आप प्रतिक्रिया दे, थोड़ी देर रूक कर पढ़े.... फिर कुछ कहते जाए...
अमृत बंटते समय
मैं भी खड़ा हो जाता
देवाताओं की पांत में
पर मैं राहू की तरह साहसी नहीं था...
पर आज भी राहू-केतू
साहस से
शापित होकर भी
सवाल खड़े किए हुए हैं
देवताओं के देवता होने पर...
सवाल
जो उठता है
देवताओं के अमरत्व पर
उनके छल पर...
भले ही नहीं सुनो
पर पूछोगे तो कभी...
"कि" इस नक्कारखाने में
तूती की यह आवाज कहां से आ रही है...गुरुवार, 29 मार्च 2012
जीवन का कूड़ेदान
घर की सफाई करते
कूड़े़ को भी
उलट-पुलट
देख लेता हूं
कई बार..
बिना जांचे-परखे
कूड़ेदान में फेंकने का मलाल
रह जाता है
जीवनभर...
शायद कुछ महत्वपुर्ण हो?
जीवन की फिलॉस्फी भी
इसी तरह है
जाने कब, कहां, कैसे
जिसे हमने फेंक दिया
कूड़ा समझ कर
आज भी है उसके फेंके जाने का मलाल
सीने में एक टीस की तरह
शायद वह भी महत्वपुर्ण होता...
शनिवार, 10 मार्च 2012
एक रोटी और

तन्हा बैठा, तो गूंज उठा शोर, अन्तः का।
शांति, तुफान के पुर्व की, या कि,
तुफानों में घिरे जीवन के मृत्यु का।
जो हो, पर अब
न तुम जूता पहन आने पर झगड़ती हो।
न मैं देर से चाय देने पर बिगड़ता हूं।।
न तुम एक रोटी और की जिद पकड़ती हो।
न मैं एक रोटी और मांगने को चिघड़ता हूं।।
और इस एक रोटी की भूख से
आत्म-क्षुधा रह रही है अतृप्त।
और कठपुतली बनी जिंदगी
ढुंढ रहा है विस्तृत।।
नंगा कर खड़ा कर दिया है दोनो को
हमारे स्पर्श की अस्पृश्यता ने।
ओह!
यह तो प्रेम की मृत्यु है
और
जीवन जीने की विवशता भी....
गुरुवार, 9 फ़रवरी 2012
बदनाम होने का हैसला चाहिए।
यूं ही विचारों कें समुद्र में उतर कर शब्दों को ढुंढने और
संजोने की आदत से लाचार कुछ लिख लेता हूं,
आपसे साझेदारी कर रहा हूं।

1
बदनाम होने का हैसला चाहिए।
अगर उल्फत है तो कुर्बान होने का भी हौसला चाहिए।
बुर्कानशी जहां में बदनाम होने का भी हौसला चाहिए।।
रोज मरते हैं यहां अकबर, सजता है मातमें बज्म भी।
बेखुद जिंदगी जी, गुमनाम मरने का भी हौसला चाहिए।।
वो जो जीते है फकत वहीं जिंदगी नहीं होती।
मुफ्लीसी में भी जीने का हौसला चाहिए।
(बज्म-सभा)
(बेखुद-आनन्दमग्न।)
2
एक मुस्लस्ल जिंदगी ही बोझ बनती है यहां,
सात जन्मांे के कसम की बात ही बेमानी है।
तुम कहो तो कर भी लूं, वादा मगर जब टूटेगा,
ये सनम यह इश्क की बदनामी है।।
3
रूठ कर जब मिलती हो सनम तो आफताब लगती हो,
मशक्कतो-मेहनत से हासिल खिताब लगती हो।
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