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शनिवार, 1 मार्च 2014

अहमक (चंद टुकड़े)

दुनिया-ए-बाज़ार में रहा अहमक की तरह।
साथी तुझे सौदागरी नहीं आती।

कुछ मोल भाव भी हो रिश्तों में। 
तुझे तक़ल्लुफ़ की बाज़ीगरी नहीं आती।
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वही शाम, वही सुबह है।
ठहरी जिंदगी, बंजर है।।

वक्त ही न मिला की खुल के साँस ले सकूँ।
ये कैसी ग़ुरबत, ये कैसा मंज़र है।।

गैर तो गैर  है उनसे शिकवा कैसा।
यहाँ तो अपनों के हाथ में खंजर है।।
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बड़े बेमुरौअत हो, संग दिल हो।
जाने क्यूँ मेरी मोहब्बत में शामिल हो।।

बुधवार, 19 फ़रवरी 2014

अब कहां अंधेरों से डर लगता है?

अब कहां अंधेरों से डर लगता है?
साथ रहा इतना, की घर लगता है।।

तेरी जुल्फों की छांव बहुत है शकून के लिए।
बिछड़ा तो, फिरूंगा दर-व-दर लगता है।।

अमावश की रात, मिले थे हम-तुम अचानक।
उस रात की न होती सुबह, हर पहर लगता है।।

छुपा लेता है आगोश में अंधेरा, भला-बुरा सब।
इसपे भी है मोहब्बत का असर लगता है।।