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शनिवार, 1 मार्च 2014
अहमक (चंद टुकड़े)
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दुनिया-ए-बाज़ार में रहा अहमक की तरह। साथी तुझे सौदागरी नहीं आती। । कुछ मोल भाव भी हो रिश्तों में। तुझे तक़ल्लुफ़ की बाज़ीगरी नहीं आती। । ...
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बुधवार, 19 फ़रवरी 2014
अब कहां अंधेरों से डर लगता है?
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अब कहां अंधेरों से डर लगता है? साथ रहा इतना, की घर लगता है।। तेरी जुल्फों की छांव बहुत है शकून के लिए। बिछड़ा तो, फिरूंगा दर-व-दर लगता ह...
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