शनिवार, 16 मार्च 2013

शिखर.....(काव्य)


शिखर पर पहुंचना बहुत मुश्किल नहीं है।
साहस
धैर्य
निरन्तर प्रयास
और जुनून हो
तो हर कोई पहुंच सकता है..

मुश्किल है शिखर पर टिक पाना !
अहं
घृणा
विवेक शून्यता की पराकष्ठा से
गिर पड़ता है
शिखर पर पहुंचा हुआ
``आदमी´´
और  टूट का बिखर जाता है.....

सोमवार, 11 मार्च 2013

फेसबुक पर दिल्लगी के कुछ बिखरे हुए टुकड़े


क्या कहूं कैसी हो तुम
बिल्कुल चांद की जैसी हो तुम....

(अभी अभी एक अतिसुंदरी की तस्वीर देख कर बेईमान मन ने शरारत की है....)

मैंने शुरूआत की और फिर जबाब/सवाल/जबाब का दौर चल निकला.


उड़ गई नींद मेरी रातों की

तेरा कैसा सवाल था साथी..



चली जाओगी बेशक मेरी ज़िन्दगी से
 मगर इस दिल से कैसे जाओगी,,,

मोहब्बत ए मरीज का दिल में रहना ही खुशनसीबी है
गौर क्या जाने दर्द, धड़कनों की सदा तुम तो सुनोगे..

वो इस चाह मेँ रहते हैँ कि हम उनको ^ उनसे माँगेँ और
हम इस गुरुर मेँ रहते हैँ कि... हम अपनी ही चीज क्यूँ माँगेँ !!!

गुरूर तो मुझको भी तेरी मोहब्बत का
खो कर भी तुझे, तेरे साथ जीये जा रहा हूं

हमने तेरे बाद न रखी किसी से महोब्बत की आस,
एक शक्स ही बहुत था जो सब कुछ सिखा गया..!!!

इक मोहब्बत ही काफी है जिन्दगी के सफर में
तुमसे फरेब क्या खाया, मुझको भी जीना आ गया..

इश्क वो खेल नहीं जो छोटे दिल वाले खेलें,
रूह तक काँप जाती है, सदमे सहते-सहते..!!!

इश्क तो रूहानी होती है, गफलत न हो
सदमो में जीना सीख जाता है रहते रहते..

सदा है मदन बाबू पहूंच ही जाएगी
अभी चली गई है तो वह लौट कर भी आएगी..


2

‘‘आज रात निंद नहीं आ रही
और कमबख्त मैं सोना भी नहीं चाहता’’

तुम जाग रहे हो मुझको अच्छा नहीं लगता
चुपके से मेरी निंदा चुरा क्यों नहीं लेते..


3

बड़े नामुराद हो, कयामत की बात करते हो

एक मैं हूं की कयामत से भी मोहब्बत कर बैठा..


रविवार, 10 मार्च 2013

अधजली लड़की


कल महाशिवरात्री के दिन ही सृष्टी की रचना करने वाली एक बेटी ने इहलीला समाप्त कर ली। वह भी एक सैतेली मां की प्रताड़ना से आजीज होकर। या मामला प्रेम प्रसंग का भी हो सकता है, छानबीन कर रहा हूं। इससे पूर्व वह अपनी शिकायत लेकर थाना गई थी पर वहां से उसे भगा दिया गया।
शेखपुरा जिले के बरबीघा रेफरल अस्पताल के बेड पर वह कराह रही थी और मेरे आंखों से आंसू बह चले। अविरल। अस्पताल कर्मी अर्जुन लाल की बीस वर्षिय पुत्री नैना ने अभी जिंदगी की दहलीज पर कदम ही रखा था ओह...
(आंसू के साथ साथ ये शब्द भी छलक पड़े...)

कैसे निर्वस्त्र पड़ी थी
वह अधजली लड़की
कराहती हुई
रोकने की कोशीश
बेकार कर 
बह चला आंखों का समुंद्र
ओह
आखिर कब तक
जलती रहेगी 
बेटियां?

हे ईश्वर
तुम भी मुझे 
अपनी ही तरह
पत्थर का बना क्यूं नहीं देते....

शुक्रवार, 22 फ़रवरी 2013

गुमराह






















जिंदगी जी जाती है अपने हिसाब है।
गुमराह लोग जीते है नजरे किताब से।।

सोहबत से जान जाओगे फितरत सभी का।
एक दिन झांक ही लेगा चेहरा नक़ाब से।।

शाकी को क्यों ढूढ़ते हो मयखाने में साथी।
रहती है यह संगदिल हसीनों के हिजाब में।।



चित्र गूगल से साभार

शनिवार, 9 फ़रवरी 2013

धुंआं-धुंआं


झुग्गी-झोपड़ियों से
निकलते धुंऐं को कभी
मौन होकर देखना...

उसमें कुछ तस्वीर
नजर आऐगी..
जो आपसे
बोलेगी, बतियायेगी....

पूछेगी एक सवाल
आखिर यहां भी तो रहते हैं
तुम्हारी तरह ही
हाड़-मांस के लोग

फिर क्यों रोज
इनके घरों से मैं नहीं निकलता?

फिर क्यों दोनों सांझ
इनका चुल्हा नहीं जलता.....?


गुरुवार, 24 जनवरी 2013

कत्ल करने का बहाना चाहिए (साथी के बोल बच्चन)


अब जहां में कत्ल करने का बस बहाना चाहिए।
दौर ऐसा है साथी तो, मोहब्बत को भी आजमाना चाहिए।।

यूं तो एक नजर में जान जाओगे कि जानवर शैतान है।
पर आदमी को जानने के लिए एक जमाना चाहिए।।

ऐसा नहीं की बसते हैं मुर्दे ही मेरे गांव में।
है उनमें भी आग, यह उनको बताना चाहिए।।

हैं फरेबी वो, दे गए धोखा हमें।
पर जानने को जिंदगी, धोखा भी खाना चाहिए।।

मंगलवार, 8 जनवरी 2013

बुरा लगता है (पाक के नापाक कदम पर ‘‘साथी’’ का दर्द)


जान कर भी बनते हो अनजान, बुरा लगता है।
फितरत से जुदा हो उनमान, बुरा लगता है।।

यूं तो कातिले-कौम हो तुम।
कहलाते हो इंसान, बुरा लगता है।।

बनकर रकीब पीठ में भोंक दो खंजर।
दोस्त बन कर देते हो यही अंजाम, बुरा लगता है।।

गुरुवार, 3 जनवरी 2013

आइए कविवर अदम गोंडकी की इन कविताओं के माध्यम से वर्तमान को देखें...

1
जिस्म क्या है रूह तक सब कुछ ख़ुलासा देखिये
आप भी इस भीड़ में घुस कर तमाशा देखिये
जो बदल सकती है इस पुलिया के मौसम का मिजाज़
उस युवा पीढ़ी के चेहरे की हताशा देखिये
जल रहा है देश यह बहला रही है क़ौम को
किस तरह अश्लील है कविता की भाषा देखिये
मतस्यगंधा फिर कोई होगी किसी ऋषि का शिकार
दूर तक फैला हुआ गहरा कुहासा देखिये.
2
आइए महसूस करिए ज़िन्दगी के ताप को
मैं चमारों की गली तक ले चलूँगा आपको
जिस गली में भुखमरी की यातना से ऊब कर
मर गई फुलिया बिचारी कि कुएँ में डूब कर
है सधी सिर पर बिनौली कंडियों की टोकरी
आ रही है सामने से हरखुआ की छोकरी
चल रही है छंद के आयाम को देती दिशा
मैं इसे कहता हूं सरजूपार की मोनालिसा
कैसी यह भयभीत है हिरनी-सी घबराई हुई
लग रही जैसे कली बेला की कुम्हलाई हुई
कल को यह वाचाल थी पर आज कैसी मौन है
जानते हो इसकी ख़ामोशी का कारण कौन है
थे यही सावन के दिन हरखू गया था हाट को
सो रही बूढ़ी ओसारे में बिछाए खाट को
डूबती सूरज की किरनें खेलती थीं रेत से
घास का गट्ठर लिए वह आ रही थी खेत से
आ रही थी वह चली खोई हुई जज्बात में
क्या पता उसको कि कोई भेड़िया है घात में
होनी से बेखबर कृष्ना बेख़बर राहों में थी
मोड़ पर घूमी तो देखा अजनबी बाहों में थी
चीख़ निकली भी तो होठों में ही घुट कर रह गई
छटपटाई पहले फिर ढीली पड़ी फिर ढह गई
दिन तो सरजू के कछारों में था कब का ढल गया
वासना की आग में कौमार्य उसका जल गया
और उस दिन ये हवेली हँस रही थी मौज़ में
होश में आई तो कृष्ना थी पिता की गोद में
जुड़ गई थी भीड़ जिसमें जोर था सैलाब था
जो भी था अपनी सुनाने के लिए बेताब था
बढ़ के मंगल ने कहा काका तू कैसे मौन है
पूछ तो बेटी से आख़िर वो दरिंदा कौन है
कोई हो संघर्ष से हम पाँव मोड़ेंगे नहीं
कच्चा खा जाएँगे ज़िन्दा उनको छोडेंगे नहीं
कैसे हो सकता है होनी कह के हम टाला करें
और ये दुश्मन बहू-बेटी से मुँह काला करें
बोला कृष्ना से बहन सो जा मेरे अनुरोध से
बच नहीं सकता है वो पापी मेरे प्रतिशोध से
पड़ गई इसकी भनक थी ठाकुरों के कान में
वे इकट्ठे हो गए थे सरचंप के दालान में
दृष्टि जिसकी है जमी भाले की लम्बी नोक पर
देखिए सुखराज सिंग बोले हैं खैनी ठोंक कर
क्या कहें सरपंच भाई क्या ज़माना आ गया
कल तलक जो पाँव के नीचे था रुतबा पा गया
कहती है सरकार कि आपस मिलजुल कर रहो
सुअर के बच्चों को अब कोरी नहीं हरिजन कहो
देखिए ना यह जो कृष्ना है चमारो के यहाँ
पड़ गया है सीप का मोती गँवारों के यहाँ
जैसे बरसाती नदी अल्हड़ नशे में चूर है
हाथ न पुट्ठे पे रखने देती है मगरूर है
भेजता भी है नहीं ससुराल इसको हरखुआ
फिर कोई बाँहों में इसको भींच ले तो क्या हुआ
आज सरजू पार अपने श्याम से टकरा गई
जाने-अनजाने वो लज्जत ज़िंदगी की पा गई
वो तो मंगल देखता था बात आगे बढ़ गई
वरना वह मरदूद इन बातों को कहने से रही
जानते हैं आप मंगल एक ही मक़्क़ार है
हरखू उसकी शह पे थाने जाने को तैयार है
कल सुबह गरदन अगर नपती है बेटे-बाप की
गाँव की गलियों में क्या इज़्ज़त रहे्गी आपकी
बात का लहजा था ऐसा ताव सबको आ गया
हाथ मूँछों पर गए माहौल भी सन्ना गया था
क्षणिक आवेश जिसमें हर युवा तैमूर था
हाँ, मगर होनी को तो कुछ और ही मंजूर था
रात जो आया न अब तूफ़ान वह पुर ज़ोर था
भोर होते ही वहाँ का दृश्य बिलकुल और था
सिर पे टोपी बेंत की लाठी संभाले हाथ में
एक दर्जन थे सिपाही ठाकुरों के साथ में
घेरकर बस्ती कहा हलके के थानेदार ने -
"जिसका मंगल नाम हो वह व्यक्ति आए सामने"
निकला मंगल झोपड़ी का पल्ला थोड़ा खोलकर
एक सिपाही ने तभी लाठी चलाई दौड़ कर
गिर पड़ा मंगल तो माथा बूट से टकरा गया
सुन पड़ा फिर "माल वो चोरी का तूने क्या किया"
"कैसी चोरी, माल कैसा" उसने जैसे ही कहा
एक लाठी फिर पड़ी बस होश फिर जाता रहा
होश खोकर वह पड़ा था झोपड़ी के द्वार पर
ठाकुरों से फिर दरोगा ने कहा ललकार कर -
"मेरा मुँह क्या देखते हो ! इसके मुँह में थूक दो
आग लाओ और इसकी झोपड़ी भी फूँक दो"
और फिर प्रतिशोध की आंधी वहाँ चलने लगी
बेसहारा निर्बलों की झोपड़ी जलने लगी
दुधमुँहा बच्चा व बुड्ढा जो वहाँ खेड़े में था
वह अभागा दीन हिंसक भीड़ के घेरे में था
घर को जलते देखकर वे होश को खोने लगे
कुछ तो मन ही मन मगर कुछ जोर से रोने लगे
"कह दो इन कुत्तों के पिल्लों से कि इतराएँ नहीं
हुक्म जब तक मैं न दूँ कोई कहीं जाए नहीं" 
यह दरोगा जी थे मुँह से शब्द झरते फूल से
आ रहे थे ठेलते लोगों को अपने रूल से
फिर दहाड़े, "इनको डंडों से सुधारा जाएगा
ठाकुरों से जो भी टकराया वो मारा जाएगा
इक सिपाही ने कहा, "साइकिल किधर को मोड़ दें
होश में आया नहीं मंगल कहो तो छोड़ दें"
बोला थानेदार, "मुर्गे की तरह मत बांग दो
होश में आया नहीं तो लाठियों पर टांग लो
ये समझते हैं कि ठाकुर से उलझना खेल है
ऐसे पाजी का ठिकाना घर नहीं है, जेल है"
पूछते रहते हैं मुझसे लोग अकसर यह सवाल
"कैसा है कहिए न सरजू पार की कृष्ना का हाल" 
उनकी उत्सुकता को शहरी नग्नता के ज्वार को
सड़ रहे जनतंत्र के मक्कार पैरोकार को
धर्म संस्कृति और नैतिकता के ठेकेदार को
प्रांत के मंत्रीगणों को केंद्र की सरकार को
मैं निमंत्रण दे रहा हूँ- आएँ मेरे गाँव में
तट पे नदियों के घनी अमराइयों की छाँव में
गाँव जिसमें आज पांचाली उघाड़ी जा रही
या अहिंसा की जहाँ पर नथ उतारी जा रही
हैं तरसते कितने ही मंगल लंगोटी के लिए
बेचती है जिस्म कितनी कृष्ना रोटी के लिए !

शुक्रवार, 28 दिसंबर 2012

रे हैवान---



(दामिनी को समर्पित)

क्या तू मां की कोख से
जनम नहीं लिया..
या कि
तू नहीं जुड़ा था
अपनी मां के
गर्भनाल से
जिससे  रिस रिस कर
भर गया जहर तुझमें...

रे हैवान
क्या तेरी मां ने नहीं
पिलाया था दूध
तुझे अपनी छाती  का...
या कि तेरी मां ने
नहीं सही थी
प्रसव की असाह्य पीड़ा...

रे हैवान
निश्चित ही तुझे
किसी मां की कोख ने
नहीं जना होगा..
तभी तो तू
नहीं जान सका
कि आखिर
हर औरत में एक मां होती है...

रे हैवान
रे हैवान
रे हैवान


शनिवार, 15 दिसंबर 2012

तोहमत


1
तोहमत लगाने का जहां में चलन है साथी,
किसी से मत कहना कि तुम पाक दामन हो।।
2
जमाने की निगाहों से कभी खुद को न देखो साथी,
खुदा ने सबको इक रूह का चश्मा दिया है।
3
वो फितरतन फरेबी हैं, तुम परेशां क्यूं हो साथी,
बुरे को इक दिन बुरा मान जाएगें लोग।

गुरुवार, 29 नवंबर 2012

दानदाता का नाम..

संगमरमर के सीने पर
छेनी से
उकेरा  जा रहा था
दानदाता  का नाम
कथित ईश्वर के घर
लगेगा आदमी का
नाम.....

उस दिन
नाली की ढक्कन पर भी
उकेरा जा रहा था
दानदाता का नाम..


शनिवार, 17 नवंबर 2012

मासूम


1
उनको इस बात का जैसे कोई इल्म न हो।
यूं जा रहे हैं जैसे दिल तोड़ना कोई जुल्म न हो।।
2
उसने फितरत ही कुछ ऐसी पाई है।
बहम, उनसे से ही सारी खुदाई है।।
3
जब्त करना भी जरूरी है जिंदगी में,
कि गैरों को जख्म दिखाए नहीं जाते।
सोहबत से ही कोई अपना नहीं होता,
अपनों से कोई बात छुपाई नहीं जाते।।


रविवार, 11 नवंबर 2012

साथी के बोल बच्चन...


तिस्नगी है साथी तो दरिया का रूख कर।
समुन्द्र की फितरत नहीं होती, प्यास को बुझाना।।

यूं तो अमीरों से सोहबत है तुम्हारी साथी।
दौरे गर्दिश में गरीब दोस्त को भी आजमाना।।

जां देकर भी जो कहीं जिक्र न करे साथी।
दोस्ती का यह सलीका भूल गया है जमाना।।

रविवार, 4 नवंबर 2012

रैली रेलमपेल -(क्षणिकाएं-साथी की कलम से)



1
रैली में आज चैनलों ने अजब घालमेल कर दिया।
एक साथ लाइव कर,
कांग्रेस-जदयू में तालमेल कर दिया।
2
रैली में सोनीया में कहा देश हित में एफडीआई लाया।
जनब हमारा कुनबा भी देश का ही नागरिक है,
इसीलिए स्वीस बैंक में देश का पैसा धर आया।।
3
रैली में राहूल ने कहा देश को बदलाव की जरूरत है।
जनाब, घोटालों की सरकार, बदलाव की ही तो सूरत है।।





बुधवार, 24 अक्टूबर 2012

रावण जिंदा रह गया!


पुतले तो जल गए, रावण जिंदा रह गया।
देख कर हाल आदमी का, राम शर्मिंदा रह गया।।

सब कुछ सफेद देख, धोखा मत खाना साथी।
बाहर से चकाचक, अंदर से गंदा रह गया।।

फैशन के दौर में गारंटी की इच्छा ना कर साथी।
अब तो दुर्गा से भंरूये भी दुआ मांगते, धंधा मंदा रह गया।

जो दिखता है सो बिकता है, पूजा, पंडाल, यज्ञ, हवन।
बेलज्जों की कमाई का साथी धंधा, चंदा रह गया।

दीन, धर्म, ईमान का चोखा है व्यापार।
सौदागरों के हाथों का साथी, औजार निंदा रह गया।।

नया दौर का नया चलन है, देखो आंख उघार।
रावण ही पुतला जला कर कहता, अब तो यह धंधा रह गया।।

शनिवार, 13 अक्टूबर 2012

दो नंबरी औरत..


अपनी पहचान पाने
देहरी से बाहर 
जब उसने कदम रखा
कदम दर कदम 
बढ़ी मंजिल की ओर
हौसला भी बढ़ा,

पर समाज ने दे दी
नई पहचान
दो नंबरी.... 
शायद औरत होने की यह सजा थी 
या  
देहरी के बाहर कदम रखने की...

यही वह सोंच रही है गुमशुम..


शनिवार, 6 अक्टूबर 2012

बेजुबां बच्चे...और उनकी कविता



इस सरकारी भवन के दरवाजे पर खड़ा होते ही अति-उत्साह के साथ आकर एक बच्चे ने ताला खोला और झट से हाथ मिलाया। पर यह क्या? वह ईशारे से चलने के लिए कह रहा था। ओह! यह बच्चा मूक-बधिर है। उसके साथ ही कई मूक बधिर बच्चे एक कमरे में बैठ कर पढ़ रहे थे। यह शिक्षा विभाग का कार्यालय था। बभनबीघा गांव में स्थित इस बीआरसी भवन में इसी तरह के बच्चों को पढ़ना, लिखना और समझने के लिए प्रशिक्षित किया जा रहा है।
यहां अति उत्साहित बच्चों ने ईशारों को समझ अपना नाम, पता सब कुछ कॉपी पर लिखने लगा। वहीं प्रशिक्षक श्रणव ने बताया कि इनकी सीखने की क्षमता बहुत प्रबल होती है और यहां अभी डेढ़ माह के लिए 35 बच्चे आवासीय रहकर प्रशिक्षण प्राप्त कर रहे है।
बिहार शिक्षा परियोजना के तहत चल रहे इस कैंप में उन बच्चों का भविष्य संबर रहा है जिन्हें यदि यहां यह प्रशिक्षण नहीं मिलता तो जीवन की इस रेस में रेंगते नजर आते...



इन बेजुबां बच्चों को कविता के माध्यम से मैंने शब्द दी है...

जीवन तो दिया मुझे भी
पर नहीं दिया सुनने
और बोलने का हक।
यानि कि
नहीं दिया जीने का अधिकार,
फिर भी मैं तुमसे नाराज कहां हूं!
जीवन दिया ,
तो जीना ही होगा।
और जीना है,
तो जीतना ही होगा....
शायद इसी जीत में
तुम अपनी जीत देखेगो
मेरे भगवान...


सोमवार, 4 जून 2012

सवाल उठाती कविता ....






















सवाल उठाती कविता
बचपन की तरह होती है
मासूम और निश्छल।

वह बोलती-बतियाती है,
सबसे,
बेझिझक,
उसे पता नहीं होता
विभेद
राजा और रंक का..

पर उसके सवाल
कभी कभी
निरूत्तर कर देतें हैं
तथाकथित बौद्धिकों को भी...


शनिवार, 26 मई 2012

देवता के होने पर सवाल उठाता राहू-केतू


कई बार जिंदगी को जीते हुए खामोशी से बिष पीना पड़ता है, कहीं कोई धन का तो कहीं कोई विद्वता का विष वमन कर देता है। मन में एक टीस सी उठती है और फिर कलम से कविता निकल पड़ती है। कहीं कहीं देवता साबित करने के लिए लोग क्या क्या नहीं करते, अपनी बुराईओं को भूल आप पर सवाल खड़े करते है, मैं आज देवता के होने पर ही सवाल खड़ा कर रहा हूं. आप प्रतिक्रिया दे, थोड़ी देर रूक कर पढ़े.... फिर कुछ कहते जाए...


अमृत बंटते समय
मैं भी खड़ा हो जाता
देवाताओं की पांत में
पर मैं राहू की तरह साहसी नहीं था...

पर आज भी राहू-केतू
साहस से
शापित होकर भी
सवाल खड़े किए हुए हैं
देवताओं के देवता होने पर...

सवाल
जो उठता है
देवताओं के अमरत्व पर
उनके छल पर...

भले ही नहीं सुनो
पर पूछोगे तो कभी...

"कि" इस नक्कारखाने में
तूती की यह आवाज कहां से आ रही है...

रविवार, 20 मई 2012

संगमरमर का आदमी



तुम तो कहते थे अमीरे शहर जन्नत होती है।
मैंने तो यहां संगेमरमर का आदमी देखा।।

तुम तो कहते थे इसके लिए है दीवानी दुनिया।
मैंने तों यहां से भागने की छटपटाहट देखी।।

तुम तो कहते थे बहुत शकूं है यहां।
उसने तो मुझसे ही शकूं का पता पूछा।।

मंगलवार, 8 मई 2012

हन्ता














आकर बैठ गया है

सिद्धांत
सांप की तरह
सिरहाने में
कुण्डली मार कर...

नागपास की तरह
जकड़ लिया है
अस्तित्व को..
और डंस रहा है
सबको
पर
हन्ता होने का एहसास
तक मुझे नहीं होता...

शनिवार, 5 मई 2012

जिंदा रहूंगा अमर होकर

खौफ मुझकों न कभी तुफां का रहा,
मैं जलता हूं अपने जुनूं का असर लेकर।

जिंदगी से है मोहब्बत, पर मौत से भी यारी है,
ये समुद्र लौट जाओं तुम अपना कहर लेकर।।

वे और होगें जो मरते हैं गुमनाम होकर,
इस जहां में मैं जिंदा रहूंगा, अमर होकर।

2
कभी कभी जिंदगी भी दगा देती है, देर तक साथ रह, सजा देती है।
बेमुरौव्वतों की वस्ती में साथी, मौत भी आकर कभी वफा देती है।।

3
गुरवतों के दिन भी तुमने शिददत से निभाई यारी।
साथी, बेमुरौव्वत जहां में तुमको नहीं आती दुनियादारी।।

बुधवार, 2 मई 2012

सजाए मौत


अपराधी की तरह
कठघरे में खड़े
प्रेम से
न्यायाधीश ने
उसके होने की वजह
पूछी,

निरूत्तर प्रेम
अपने अस्तित्व का
कोई वजह
नहीं कर सका पेश

और
न्यायाधीश ने उसे
सजाए मौत दे दी.....

मंगलवार, 1 मई 2012

मजदूर..


सर झुकाये
मौन
चुपचाप..
सुन रहा है गालियां..
पूरे दस मिनट देर से काम पर आया है
गुनहगार!
.
.
थक गया है
काम करते-करते
खैनी बनाने के बहाने सुस्ता रहा है,
या फिर मूतने का बनाता है बहाना।

मालिक फिर चिल्लाया..
साले

हरामी

इसी बात की मजदूरी देता हूं....

हमारे घर भी आते हैं ये मजदूर!



(मजदूर दिवस पर एक पुरानी रचना)

बुधवार, 25 अप्रैल 2012

खूबसूरत स्तन


भूख से बिलखने पर
मां ने स्तन निकाल कर
बच्चे के मूंह में लगा दिया
वासनातुर नजरों से बेखबर
भरी बाजार में....

बेलज, असभ्य, जंगली,
संभ्रांत सी महिला ने ताना दिया...

ब्रेस्ट क्लीवेज
और
ब्रेस्ट इम्प्लांट
के नेक्स्ट जेनरेशन में
अब ऐसी
बेलज,
असभ्य,
और जंगली मां
कहां मिलेगी...