अहले सुबह अलसाये
जब यात्री अपने वर्थ से
नीचे उतरे तो बिखड़ी गंदगी को देख
नाक मुंह सिंकोड़ने लगे..
गंदा तो सभी ने किया पर साफ कौन करेगा?
फिर सीख लेते हैं इसी तरह जीना
गंदगी के साथ....
तभी भावशुन्य चेहरे के साथ आता है
वह आदमी
चिथड़ों में लिपटा शरीर
भनभनाती मख्खियां..
और बुहारने लगता है..
तभी एक सज्जन पिच्च से पान की पिरकी
फेंकते हुए कहते हैं
‘‘पागल’’?
गंदगी को फेंक लौटा
वह आदमी..
भावशुन्य चेहरे के साथ
फैला कर अपना हाथ
खामोशी से देखता रहा
सबको बारी बारी
तभी मैं डर गया
लगा जैसे
वह कह रहा हो
कितने गंदे लोग
कितना गंदा समाज
कितने पागल एक साथ.....






















