गुरुवार, 3 मार्च 2011
मंगलवार, 15 फ़रवरी 2011
Joke of the year by Digvijay Singh ...
Joke of the year by Digvijay Singh ...
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» Digvijay Singh advises BJP to follow Gandhi's footsteps not Godse's...
» MY ---- advises Congress & Digvijay Singh to follow Gandhi's footsteps not Jinnah's...
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Note - Digvijay Singh isn't well please send him Get Well Soon messages !
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सोमवार, 14 फ़रवरी 2011
अखबारों की हेडलाइन की कतरनी कविता
संजीव कुमार की चुटीली कविता
गॉधी शताब्दी का शुभारम्भ,
दो व्यक्तियों ने जमकर लाठी चलाई।
मद्य निषेध दिवस धूम-धाम से मना,
जहरीली शराब पीने से सात व्यक्तियों की मौत।
शिक्षा में आशातीत प्रगति,
छात्र के झोले से बम बरामद।
परिवार नियोजन सप्ताह संपन्न,
एक महिला ने एक साथ चार बच्चों को जन्म दिया।
सूबे में सुरक्षा व्यवस्था चुस्त,
डी.एस.पी. के घर पर बम से हमला।
देश में खाद्यान की कोई नहीं-मंत्री,
आंध्रप्रदेश में सात दिन से भुखे किसान ने दम तोड़ा।
खाद्यान्न मुद्रा स्फीति में भारी गिरावट,
प्याज के दामों में पॉच गुना वृद्धि।
वेलेन्टाइन डे पे खुब लुटाया प्यार का तोहफा।
एक लड़के ने अपनी प्रेमिका के चेहरे पर तेजाब फेंका।
हर बच्चे को पोलियों ड्राप्स का दो बुंद पिलाना है पोलियों दुर भगाना है।
लगातार पॉच वर्षो से पोलियो ड्राप्स पीने वाले बच्चे पोलियो ग्रसित हुए।
रविवार, 13 फ़रवरी 2011
हार्ट हॉस्पीटल।
किस्सा कुछ समझ न पाया,
एक होडिंग जब नजर में आया।
पढ़कर कुछ मन घबराया,
आगे पढ़ने को उकसाया।
लिखा था..
नये वॉल्व लगाये,
या पुराना वॉल्व
रिपेयर करायें।
छः माह की गारंटी देशी में,
तीन साल की गारंटी विदेशी में।
सोंचा मैंने
गाड़ियों का गैराज
खुबसुरत है कितना,
शब्दों में मुश्किल है उसको लिखना।
फिर मोटे हरफों पर नजर गई,
पांव वहीं पर ठहर गये.
लिखा था
‘‘जीवक हार्ट हॉस्पीटल’’
यहां है
सरकारी कर्मचारियों, नेताओं के लिए है
व्यवस्था विशेष,
समझने को रह गया फिर कुछ शेष।
क्या नेता-अधिकारियों के वॉल्व होते है
जल्दी खराब,
तभी तो है यह निर्देश,
उनके लिए व्यवस्था विशेष।
समझ गया तब मैं एक बात,
ये लोग होते है क्यों संगदिल,
क्योंकि कृत्रिम होतें है इनके दिल।
होते हैं ये बड़े हार्ड,
क्यांेकि
नकली होता है इनका हार्ट।
सोमवार, 17 जनवरी 2011
डर है की तुम डर नहीं रहे हो
नहीं नहीं
वैसे समय में
जब
सब
कर रहें हों उपक्रम
तुम्हें चुप कराने का
तुम चुप मत रहना,,
नहीं नहीं
वैसे समय में
जबकि
सल्तनत के बादशाह
देकर लोकतंत्र की दुहाई
तेरी जुवान सिल देना चाहतें हों
तुम जोर जोर से चिल्लाना,,
नहीं नहीं
वैसे समय में
यह सोंच कर
कि कहीं तुम भी कहलाओ
बागी
एक आवाज लगाना,,
नहीं नहीं
तुम डर मत जाना
क्योंकि
डर तो वे रहें है
कि
तुम डर नहीं रहे हो..............
रविवार, 9 जनवरी 2011
पाती प्रेम की
तेरे सौन्दर्यबोध में
मैंने बहुत से शब्द ढूंढे
अपनी भावनाओं को
कोरे कागज पर बारंबार
उकेरा...
शब्द शर्मा जाते
हर बार...।
फिर इस तरह किया मैने
अपनी भावनाओं को अभिव्यक्त
गुलाब की एक अबोध पंखुड़ी को
लिफाफे में बंद कर
तुम्हें भेज दिया।.
प्रियतम तुम हो ..............
प्रियतम तुम हो
सुबह का सूरज
जिसकी आभा से खिलता रहै
जीवन का फुल
सावन की मादक बून्द
जिसके स्पशZ से
भींग जाता है
अन्र्तमन।
पुरबा बयार
जो सांसों में आविष्ट हो
तृषित जीवन को करती है
तृप्त।
अन्तत:
तुम हो तो है
जीने की सार्थकता
और
मृत्यु के आलिंगन का आन्नद भी.....
शनिवार, 1 जनवरी 2011
तलाक (चुटकी)
पत्नी पीड़ित पति ने
तलाक का खर्चा पूछा
वकील साहब ने कहा एक हजार
भड़ककर पति महोदय ने कहा
वाह सरकार
शादी में पंडित ने खर्च कराये
कुल रूपये चार
तलाक में आप लेगें एक हजार।
वकील ने तपाक से कहा
बिल्कुल सही कह रहे हो
और
सस्ते काम का परिणाम ही
तो सह रहे हो।
बुधवार, 15 दिसंबर 2010
मैं भला आदमी नहीं बनना चाहता
मैं भला आदमी नहीं बनना चाहता।
समाज के विभ्रन्स आईने में
संवार कर अपना चेहरा,
तज कर अपना अस्तित्व
पहनना समाजिक मुखौटा,
मैं भला आदमी नहीं बनना चाहता।
समाज के विभ्रन्स आईने में
संवार कर अपना चेहरा,
तज कर अपना अस्तित्व
पहनना समाजिक मुखौटा,
मैं भला आदमी नहीं बनना चाहता।
मैं नहीं प्रस्तुत कर सकता
खुद को खुली किताब की तरह,
जिसमें है कई स्याह पन्ने
और कहीं कहीं धृणा
और दम्भ से लिखी गई इबारत।
मैं भला आदमी नहीं बनना चाहता।
खुद को खुली किताब की तरह,
जिसमें है कई स्याह पन्ने
और कहीं कहीं धृणा
और दम्भ से लिखी गई इबारत।
मैं भला आदमी नहीं बनना चाहता।
मैं रोज सुबह उठकर
नहीं दे सकता बांग,
उनके बीच जो करना चाहतें हैं
मेरा जिबह।
काले लिबास मे लिपटे
समाजिक न्यायाधिशों के कठघरे में
साष्टांग लेट
मैं नहीं कर सकता जिरह।
मैं आदमी हूं
आदमी ही रहने दो भला मत बनाओ.
नहीं दे सकता बांग,
उनके बीच जो करना चाहतें हैं
मेरा जिबह।
काले लिबास मे लिपटे
समाजिक न्यायाधिशों के कठघरे में
साष्टांग लेट
मैं नहीं कर सकता जिरह।
मैं आदमी हूं
आदमी ही रहने दो भला मत बनाओ.
प्रेम....काव्य-(कारण)
पूछा दोस्तों ने मुझसे
क्यों प्रेम किया तुमसे
मैने कहा पता नहीं
सभी ने पूछा
पर मां
वो समझती थी केवल
तुम्हारे घरवाले ने कहा
सारी बुराइयों है मुझमें
कारण सभी जानना चाहतें है
किसे पता है
प्रेम में कारण नहीं होता!
रविवार, 12 दिसंबर 2010
पुरानी फाइलों को उलटते कलटते पांच साल पूर्व कागज के टुकड़ों पर लिखे दिल की बात के कुछ पन्ने मिल गए, सोंचा आपसे सांझा कर लूं, पेश है-
इसे संयोग कहे या दुर्योग, आज दो वाक्या एक सा घटी। प्रथम हिंन्दी दैनक ‘‘आज’’ में मेरे द्वारा गेसिंग (जुआ) के अवैध धंधे से संबन्धित समाचार जिसमें हमने बरबीघा नगर पंचायत के प्रतिनिधियों का इस धंधें में संलिप्त रहने की बात उजागर की थी, को लेकर नगर पंचायत अध्यक्ष अजय कुमार द्वारा तिव्र प्रतिरोध दर्ज किया गया और मुकदमा करने से लेकर पत्रकारिता की सीमाओं (उनके द्वारा व्यवस्था का विरोध न करना ही पत्रकारिता है) का ज्ञान भी कराया गया। मैं भी भीर गया बहस हुई।
दूसरा वाकया साहित्यिक पत्रिका पुनर्नावा में हिंदी जगत के प्रमुख हस्ताक्षर और कवि-पत्रकार स्व. नरेन्द्र मोहन की कविता पढ़ी जो निम्नवत थी.....
एक सवाल
जो मेरा मन मुझसे
नित्य पूछता
मुझे ही
जांचता, परखता
वह है-
विवशताओं से बंधी
लट्टू सी धूमती यह बंजर
जिंदगी
है किस काम की?
-यह जिंदगी
कठपुतली?
बहुत देर तक मौन सोचता रहा। कठपुतली? मानवेत्तर गुणों में हो रे चातुर्दिक गिरावट क्या इस बात का द्योतक नहीं कि आज के समाज में जिवित आदमी के लिए स्थान नहीं। सच, विवशताओं में बंधी हर आदमी की जिन्दगी एक बंजर जमीन है। तब प्रश्न यह भी अनुत्तरित रह जाती है कि बंजर जिंदगी भला है किस काम की?
फिर एक और कविता कवि शिवओम अंबर की पढ़ी
अपमानित होकर के भी मुसकाना पड़ता है,
इस वस्ती में राजहंस के वंशज को यारों
काकवंश की प्रशस्तियों को गाना पड़ता है।
स्याह सियासत लिखती है
खाते संधर्षों के,
कोना फटा लिए मिलते हैं
खत आदर्शो के।
सबकुछ जान बूझ कर चुप रज जाना पड़ता है
इस वस्ती में विवश बृहस्पति की मृगछाला को
इन्द्रासन से तालमेल बैठाना पड़ता है।
काकवंश की प्रशस्तियों को गाना पड़ता है।
जुगनू सूरज को प्रकाश का अर्थ बताते है,
यहां दिग्भ्रमित, पंथ-प्रदर्शक माने जाते है।
हर जुलूस में जैकारा बुलवाना पड़ता है।
काकवंश की प्रशस्तियों को गाना पड़ता है।
इस वस्ती में उंचाई मिलती तो है लेकिन
खुद अपनी नजरों में ही गिर जाना पड़ता है।
काकवंश की प्रशस्तियों को गाना पड़ता है।
और फिर उठखड़ा हुआ मैं सतत अपनी चाल में चलने के लिए..... सफर अभी जारी है।
दूसरा वाकया साहित्यिक पत्रिका पुनर्नावा में हिंदी जगत के प्रमुख हस्ताक्षर और कवि-पत्रकार स्व. नरेन्द्र मोहन की कविता पढ़ी जो निम्नवत थी.....
एक सवाल
जो मेरा मन मुझसे
नित्य पूछता
मुझे ही
जांचता, परखता
वह है-
विवशताओं से बंधी
लट्टू सी धूमती यह बंजर
जिंदगी
है किस काम की?
-यह जिंदगी
कठपुतली?
बहुत देर तक मौन सोचता रहा। कठपुतली? मानवेत्तर गुणों में हो रे चातुर्दिक गिरावट क्या इस बात का द्योतक नहीं कि आज के समाज में जिवित आदमी के लिए स्थान नहीं। सच, विवशताओं में बंधी हर आदमी की जिन्दगी एक बंजर जमीन है। तब प्रश्न यह भी अनुत्तरित रह जाती है कि बंजर जिंदगी भला है किस काम की?
फिर एक और कविता कवि शिवओम अंबर की पढ़ी
अपमानित होकर के भी मुसकाना पड़ता है,
इस वस्ती में राजहंस के वंशज को यारों
काकवंश की प्रशस्तियों को गाना पड़ता है।
स्याह सियासत लिखती है
खाते संधर्षों के,
कोना फटा लिए मिलते हैं
खत आदर्शो के।
सबकुछ जान बूझ कर चुप रज जाना पड़ता है
इस वस्ती में विवश बृहस्पति की मृगछाला को
इन्द्रासन से तालमेल बैठाना पड़ता है।
काकवंश की प्रशस्तियों को गाना पड़ता है।
जुगनू सूरज को प्रकाश का अर्थ बताते है,
यहां दिग्भ्रमित, पंथ-प्रदर्शक माने जाते है।
हर जुलूस में जैकारा बुलवाना पड़ता है।
काकवंश की प्रशस्तियों को गाना पड़ता है।
इस वस्ती में उंचाई मिलती तो है लेकिन
खुद अपनी नजरों में ही गिर जाना पड़ता है।
काकवंश की प्रशस्तियों को गाना पड़ता है।
और फिर उठखड़ा हुआ मैं सतत अपनी चाल में चलने के लिए..... सफर अभी जारी है।
शुक्रवार, 10 दिसंबर 2010
कहीं आग नहीं, फिर भी धुआं क्यूं है
कहीं आग नहीं, फिर भी धुआं क्यूं है।
तन्हाई के सफर में भी कारवां क्यूं है।
कभी तो खामोशी की जुवां को समझो साथी,
क्यों पूछते हो, यह अपनों के दरम्यां क्यूं है।
दुनियादार तुम भी नहीं हो मेरी तरह शायद,
तभी तो कहते हो कि जुल्म की इम्तहां क्यूं है।
यह नासमझी नहीं तो और क्या है,
कि जिस चमन में माली नहीं, और पूछते हो यह विरां क्यूं है।
शीशा-ऐ-दिल से दिल्लगी है उनकी फितरत,
गाफील तुम, पूछते हो संगदिल बेवफा क्यूं है।
इस काली अंधेरी रात में साथी चराग बन,
शीश-महलों को देख डोलता तेरा भी इमां क्यूं है।
कभी तो अपनी गुस्ताखियां देखों साथी,
की अब बन्दे भी यहॉ खुदा क्यूं है।
गुरुवार, 9 दिसंबर 2010
नेतवा सब भरमाबो है. (मगही कविता)
अब तो नेतवा सब जनता के देखा खूब भरमाबो है.
गली गली जे दारू बेचे, ओकरे खूब जीताबो है.
पहले हलथिन रंगबाज
फिर कहलैलथिन ठेकेदार
अब हो गेलथिन एमएलए
जनसेवका के सब हंसी उडाबो है।
अब तो नेतवा सब जनता के देखा खूब भरमाबो है.
सूट बूट है उजर बगबग
स्कारपीयों करो है जगमग
टूटल साईकिल से ई लगदग
कहां से, कोय नै ई बतावो है।
अब तो नेतवा सब जनता के देखा खूब भरमाबो है.
अनपढ़ हो गेलइ हे मास्टर
गोबरठोकनी हो गेलइ हे सिस्टर
बड़का बाप के बेटा हे डागडर
फर्जी डिग्री के फेरा में
ग्रेजुएट भैंस चराबो है।
अब तो नेतवा सब जनता के देखा खूब भरमाबो है
कभी मण्डल
कभी कमण्डल
कभी राम और
कभी रहीम
आग लगाके नेतवन सब
घर बैठल मौज उड़ावो है।
अब तो नेतवा सब जनता के देखा खूब भरमाबो है
की कुशासन
की सुशासन
गरीबन झोपड़ी नै राशन
चपरासी से अफसर तक
सभे महल बनाबो है।
अब तो नेतवा सब जनता के देखा खूब भरमाबो है
लोकतन्त्र में
कागवंश के
राजहंश सब
बिरदावली अब गावो है
चौथोखंभा भी रंगले सीयरा संग
हुआ हुआ चिल्लाबो है
हुआ हुआ चिल्लावो है..........
गली गली जे दारू बेचे, ओकरे खूब जीताबो है.
पहले हलथिन रंगबाज
फिर कहलैलथिन ठेकेदार
अब हो गेलथिन एमएलए
जनसेवका के सब हंसी उडाबो है।
अब तो नेतवा सब जनता के देखा खूब भरमाबो है.
सूट बूट है उजर बगबग
स्कारपीयों करो है जगमग
टूटल साईकिल से ई लगदग
कहां से, कोय नै ई बतावो है।
अब तो नेतवा सब जनता के देखा खूब भरमाबो है.
अनपढ़ हो गेलइ हे मास्टर
गोबरठोकनी हो गेलइ हे सिस्टर
बड़का बाप के बेटा हे डागडर
फर्जी डिग्री के फेरा में
ग्रेजुएट भैंस चराबो है।
अब तो नेतवा सब जनता के देखा खूब भरमाबो है
कभी मण्डल
कभी कमण्डल
कभी राम और
कभी रहीम
आग लगाके नेतवन सब
घर बैठल मौज उड़ावो है।
अब तो नेतवा सब जनता के देखा खूब भरमाबो है
की कुशासन
की सुशासन
गरीबन झोपड़ी नै राशन
चपरासी से अफसर तक
सभे महल बनाबो है।
अब तो नेतवा सब जनता के देखा खूब भरमाबो है
लोकतन्त्र में
कागवंश के
राजहंश सब
बिरदावली अब गावो है
चौथोखंभा भी रंगले सीयरा संग
हुआ हुआ चिल्लाबो है
हुआ हुआ चिल्लावो है..........
गुरुवार, 4 नवंबर 2010
अंधकार का अपना अस्तित नहीं होता, जहां कहीं भी रौशनी होगी, अंधकार नहीं होगा......आचार्य रजनीश. .
अंधकार का अपना अस्तित नहीं होता, जहां कहीं भी रौशनी होगी, अंधकार नहीं होगा......आचार्य रजनीश.
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रौशनी के पावन पर्व की मंगलकामनाऎं.............
गुरुवार, 28 अक्टूबर 2010
सपना और सपनों का सच
सपना और
सपनों का सच
सपनों के लिए है जरूरी
नीन्द का होना
निबाZेध और
निर्जीव सा होना
सपनों के लिए है जरूरी
आदमी को चैन से सोना...
सपना
सच है अन्त:करण का
सपना सच है
जीवन और मरन का.....
सपनों से आगे भागो तुम
सपनों से सो कर जागो तुम
सपना है अन्त: का विस्फोट
सपना है अन्त: का आक्रोश
सपना है अन्त: का स्नेह
सपना है अन्त: का क्लेश
सपना भले ही सपना है
सपना ही शास्वत अपना है.......
सपनों का सच
सपनों के लिए है जरूरी
नीन्द का होना
निबाZेध और
निर्जीव सा होना
सपनों के लिए है जरूरी
आदमी को चैन से सोना...
सपना
सच है अन्त:करण का
सपना सच है
जीवन और मरन का.....
सपनों से आगे भागो तुम
सपनों से सो कर जागो तुम
सपना है अन्त: का विस्फोट
सपना है अन्त: का आक्रोश
सपना है अन्त: का स्नेह
सपना है अन्त: का क्लेश
सपना भले ही सपना है
सपना ही शास्वत अपना है.......
गुरुवार, 16 सितंबर 2010
गुलजार की कुछ नज्में
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गुरुवार, 9 सितंबर 2010
जरूरी तो नहीं।
हर ख्वाब की तामीर हो,
जरूरी तो नहीं।
हर शक्स की अच्छी तकदीर हो,
जरूरी तो नहीं।
माना कि मदहोश कर देती हो तुम शाकी,
बहक जाय हर शख्स,
जरूरी तो नहीं।
बहुत हसीन शोहबतें तेरी हमदम,
हासील हो सभी को ,
जरूरी तो नहीं।
सच है, तेरे चाहने वाले हैं कई,
बन जाओ सभी की ,
जरूरी तो नहीं।
तेरा आइना तुझे जी भर के देखता होगा,
हर सय की आइने सी तकदीर हो,
जरूरी तो नहीं।
कोई तो तेरे ख्वाब में आता होगा,
मुझे भी तुम बुलाओं,
जरूरी तो नहीं।
चाहा है मैंने तुझे जानो दिल से बढ़कर,
तुम भी मुझे चाहो,
जरूरी तो नहीं।
शनिवार, 4 सितंबर 2010
शनिवार, 21 अगस्त 2010
शुक्रवार, 20 अगस्त 2010
नरेन्द्र मोदी को बिहार अवश्य आना चाहिए......
नरेन्द्र मोदी के लिए सबसे पहले टुडे ग्रुप के संपादक प्रभु चावल की टिप्पणी को उदिृत करना चाहूंगा जिसके अनुसार नरेन्द्र मोदी से सभी नफरत करते है सिबाय जनता के। इण्डिया टुडे के हालिया सर्वे में मोदी के देश के नंबर 1 मुख्यमन्त्री है। अब बिहार में होने बाले चुनाव में अभी सबसे बड़ा मुददा यही है कि नरेन्द्र मोदी और बरूण गांधी को बिहार आना चाहिए या नहीं। मेरा मानना है कि नरेन्द्र मोदी को बिहार अवश्य आना चाहिए, खास कर मोदी का बिहार दौरा देश की भावी राजनीति को तय करेगा।
आज देश की राजनीति जिस करबट ले रही है बैसे समय में एक बार फिर बिहार देश को राजनीतिक दिशा दे सकता है। आज देश के लिए सबसे प्राणधातक पहल मुस्लिम तुस्टीकरण के नाम पर आतंकबादियों का तुष्टीकरण है। आने वाले दिनों में वोट की यह राजनीति देश को डुबोएगी। मेरा मानना है कि देश की राजनीति आज जहां खड़ी है वहां आतंकबाद से भी बड़ मुददा आतंकबाद के नाम पर मुस्लिम तुष्टीकरण नीति के साथ साथ हिन्दू आतंकबाद जैसे शब्द को प्रयोजित करना है। अब जबकि सीबीआई ने मोदी को िक्लन चिट दे दी है तब नीतिश कुमार को भी एक मौका मिला है और वह भी तुष्टीकरण की इस नीति का परित्याग कर आगे बढ़े। धर्मनिरेपक्षता के आड़ में दोहरी नीति चलाने बाले राजनीतिज्ञों के दो चेहरे सामने आना ही चाहिए। जब बिहार में जामा मिस्जद के इमाम बुखारी बिहार में चुनावी गुहार लगा सकते है तब नरेन्द्र मोदी और बरूण गांधी क्यों नहीं। भाजपा को आगे आकर सत्ता की छोटी सी चाह को दरकिनार कर देश के भविष्य की सोचनी चाहिए।
आज देश की राजनीति जिस करबट ले रही है बैसे समय में एक बार फिर बिहार देश को राजनीतिक दिशा दे सकता है। आज देश के लिए सबसे प्राणधातक पहल मुस्लिम तुस्टीकरण के नाम पर आतंकबादियों का तुष्टीकरण है। आने वाले दिनों में वोट की यह राजनीति देश को डुबोएगी। मेरा मानना है कि देश की राजनीति आज जहां खड़ी है वहां आतंकबाद से भी बड़ मुददा आतंकबाद के नाम पर मुस्लिम तुष्टीकरण नीति के साथ साथ हिन्दू आतंकबाद जैसे शब्द को प्रयोजित करना है। अब जबकि सीबीआई ने मोदी को िक्लन चिट दे दी है तब नीतिश कुमार को भी एक मौका मिला है और वह भी तुष्टीकरण की इस नीति का परित्याग कर आगे बढ़े। धर्मनिरेपक्षता के आड़ में दोहरी नीति चलाने बाले राजनीतिज्ञों के दो चेहरे सामने आना ही चाहिए। जब बिहार में जामा मिस्जद के इमाम बुखारी बिहार में चुनावी गुहार लगा सकते है तब नरेन्द्र मोदी और बरूण गांधी क्यों नहीं। भाजपा को आगे आकर सत्ता की छोटी सी चाह को दरकिनार कर देश के भविष्य की सोचनी चाहिए।
बुधवार, 18 अगस्त 2010
दुष्यंत कुमार - तीन गजल
कहाँ तो तय था चिराग़ाँ हर एक घर के लिए
कहाँ तो तय था चिराग़ाँ हर एक घर के लिए
कहाँ चिराग़ मयस्सर नहीं शहर के लिए
यहाँ दरख़तों के साये में धूप लगती है
चलो यहाँ से चलें और उम्र भर के लिए
न हो कमीज़ तो पाँओं से पेट ढँक लेंगे
ये लोग कितने मुनासिब हैं इस सफ़र के लिए
ख़ुदा नहीं न सही आदमी का ख़्वाब सही
कोई हसीन नज़ारा तो है नज़र के लिए
वो मुतमइन हैं कि पत्थर पिघल नहीं सकता
मैं बेक़रार हूँ आवाज़ में असर के लिए
तेरा निज़ाम है सिल दे ज़ुबान शायर की
ये एहतियात ज़रूरी है इस बहर के लिए
जिएँ तो अपने बग़ीचे में गुलमोहर के तले
मरें तो ग़ैर की गलियों में गुलमोहर के लिए
आज सड़कों पर लिखे हैं सैंकड़ों नारे न देख
आज सड़कों पर लिखे हैं सैंकड़ों नारे न देख
घर अँधेरा देख तू आकाश के तारे न देख
एक दरिया है यहाँ पर दूर तक फैला हुआ
आज अपने बाजुओं को देख पतवारें न देख
अब यक़ीनन ठोस है धरती हक़ीक़त की तरह
यह हक़ीक़त देख, लेकिन ख़ौफ़ के मारे न देख
वे सहारे भी नहीं अब जंग लड़नी है तुझे
कट चुके जो हाथ ,उन हाथों में तलवारें न देख
दिल को बहला ले इजाज़त है मगर इतना न उड़
रोज़ सपने देख, लेकिन इस क़दर प्यारे न देख
ये धुँधलका है नज़र का,तू महज़ मायूस है
रोज़नों को देख,दीवारों में दीवारें न देख
रख्ह,कितनी राख है चारों तरफ़ बिखरी हुई
राख में चिंगारियाँ ही देख, अँगारे न देख.
मैं जिसे ओढ़ता—बिछाता हूँ
मैं जिसे ओढ़ता—बिछाता हूँ
वो ग़ज़ल आपको सुनाता हूँ
एक जंगल है तेरी आँखों में
मैं जहाँ राह भूल जाता हूँ
तू किसी रेल—सी गुज़रती है
मैं किसी पुल—सा थरथराता हूँ
हर तरफ़ ऐतराज़ होता है
मैं अगर रौशनी में आता हूँ
एक बाज़ू उखड़ गया जबसे
और ज़्यादा वज़न उठाता हूँ
मैं तुझे भूलने की कोशिश में
आज कितने क़रीब पाता हूँ
कौन ये फ़ासला निभाएगा
मैं फ़रिश्ता हूँ सच बताता हूँ
रविवार, 1 अगस्त 2010
"If you are in trouble, if you need a hand, just call my number, because i'm your friend "
"If you are in trouble,
if you need a hand,
just call my number,
because i'm your friend "
if you need a hand,
just call my number,
because i'm your friend "
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