साथी

शुक्रवार, 28 दिसंबर 2012

रे हैवान---

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(दामिनी को समर्पित) क्या तू मां की कोख से जनम नहीं लिया.. या कि तू नहीं जुड़ा था अपनी मां के गर्भनाल से जिससे  रिस रिस कर भर गया...
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शनिवार, 15 दिसंबर 2012

तोहमत

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1 तोहमत लगाने का जहां में चलन है साथी, किसी से मत कहना कि तुम पाक दामन हो।। 2 जमाने की निगाहों से कभी खुद को न देखो साथी, खुदा ...
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गुरुवार, 29 नवंबर 2012

दानदाता का नाम..

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संगमरमर के सीने पर छेनी से उकेरा  जा रहा था दानदाता  का नाम कथित ईश्वर के घर लगेगा आदमी का नाम..... उस दिन नाली की ढक्कन पर भी उक...
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शनिवार, 17 नवंबर 2012

मासूम

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1 उनको इस बात का जैसे कोई इल्म न हो। यूं जा रहे हैं जैसे दिल तोड़ना कोई जुल्म न हो।। 2 उसने फितरत ही कुछ ऐसी पाई है। बहम, उनसे से ही ...
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रविवार, 11 नवंबर 2012

साथी के बोल बच्चन...

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तिस्नगी है साथी तो दरिया का रूख कर। समुन्द्र की फितरत नहीं होती, प्यास को बुझाना।। यूं तो अमीरों से सोहबत है तुम्हारी साथी। दौरे गर्दि...
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रविवार, 4 नवंबर 2012

रैली रेलमपेल -(क्षणिकाएं-साथी की कलम से)

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1 रैली में आज चैनलों ने अजब घालमेल कर दिया। एक साथ लाइव कर, कांग्रेस-जदयू में तालमेल कर दिया। 2 रैली में सोनीया में कहा देश हित में ...
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बुधवार, 24 अक्टूबर 2012

रावण जिंदा रह गया!

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पुतले तो जल गए, रावण जिंदा रह गया। देख कर हाल आदमी का, राम शर्मिंदा रह गया।। सब कुछ सफेद देख, धोखा मत खाना साथी। बाहर से चकाचक, अंदर स...
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शनिवार, 13 अक्टूबर 2012

दो नंबरी औरत..

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अपनी पहचान पाने देहरी से बाहर  जब उसने कदम रखा कदम दर कदम  बढ़ी मंजिल की ओर हौसला भी बढ़ा, पर समाज ने दे दी नई पहचान ...
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शनिवार, 6 अक्टूबर 2012

बेजुबां बच्चे...और उनकी कविता

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इस सरकारी भवन के दरवाजे पर खड़ा होते ही अति-उत्साह के साथ आकर एक बच्चे ने ताला खोला और झट से हाथ मिलाया। पर यह क्या? वह ईशारे से चलने के ...
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सोमवार, 4 जून 2012

सवाल उठाती कविता ....

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सवाल उठाती कविता बचपन की तरह होती है मासूम और निश्छल। वह बोलती-बतियाती है, सबसे, बेझिझक, उसे पता नहीं होता व...
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शनिवार, 26 मई 2012

देवता के होने पर सवाल उठाता राहू-केतू

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कई बार जिंदगी को जीते हुए खामोशी से बिष पीना पड़ता है, कहीं कोई धन का तो कहीं कोई विद्वता का विष वमन कर देता है। मन में एक टीस सी उठती है ...
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रविवार, 20 मई 2012

संगमरमर का आदमी

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तुम तो कहते थे अमीरे शहर जन्नत होती है। मैंने तो यहां संगेमरमर का आदमी देखा।। तुम तो कहते थे इसके लिए है दीवानी दुनिया। मैंने तों यहा...
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मंगलवार, 8 मई 2012

हन्ता

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आकर बैठ गया है सिद्धांत सांप की तरह सिरहाने में कुण्डली मार कर... नागपास की तरह जकड़ लिया है अस्तित्व को.. और डंस ...
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शनिवार, 5 मई 2012

जिंदा रहूंगा अमर होकर

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खौफ मुझकों न कभी तुफां का रहा, मैं जलता हूं अपने जुनूं का असर लेकर। जिंदगी से है मोहब्बत, पर मौत से भी यारी है, ये समुद्र लौट जाओं तुम ...
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बुधवार, 2 मई 2012

सजाए मौत

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अपराधी की तरह कठघरे में खड़े प्रेम से न्यायाधीश ने उसके होने की वजह पूछी, निरूत्तर प्रेम अपने अस्तित्व का कोई वजह नहीं कर सका ...
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मंगलवार, 1 मई 2012

मजदूर..

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सर झुकाये मौन चुपचाप.. सुन रहा है गालियां.. पूरे दस मिनट देर से काम पर आया है गुनहगार! . . थक गया है काम करते-करते खैनी बनाने के...
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बुधवार, 25 अप्रैल 2012

खूबसूरत स्तन

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भूख से बिलखने पर मां ने स्तन निकाल कर बच्चे के मूंह में लगा दिया वासनातुर नजरों से बेखबर भरी बाजार में.... बेलज, असभ्य, जंगली, सं...
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सोमवार, 16 अप्रैल 2012

लबादा

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लबादा ओढ़ कर जीते हुए सबकुछ हरा हरा दिखता है बिल्कुल सावन में अंधें हुए गदहे की तरह। लबादे को टांग कर अलगनी पर जब निकलोगे बनकर आमआ...
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रविवार, 15 अप्रैल 2012

शुन्य का सिद्धांत

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जिंदगी गणित की किताब है। दशमलव, सम और विभाजन अध्यायों की तरह जटिलताओं के साथ सामने आ जाती है अचानक... गुणनफल और भागफल की अतिमहत्...
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शनिवार, 7 अप्रैल 2012

गजल

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न हिंदू लगता है, न मुस्लमान लगता है। अजीब शय है वह, इंसान लगता है।। यूं तो फरीस्ते ही सभी है इस कब्रिस्तान में। अदब से जो शख्स शैतान ल...
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बुधवार, 4 अप्रैल 2012

तुम आदमी हो या राक्षस..

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उनकी बात क्यों करते हो जिन्होंने रंग-रोगन किए महलों और चमकते कंगूरों से सजा लिया है अपना बाह्य...। उनको भी क्यो...
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गुरुवार, 29 मार्च 2012

जीवन का कूड़ेदान

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घर की सफाई करते कूड़े़ को भी उलट-पुलट देख लेता हूं कई बार.. बिना जांचे-परखे कूड़ेदान में फेंकने का मलाल रह जाता है ज...
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मंगलवार, 27 मार्च 2012

प्रेम-काव्य

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प्रेम की कविता केवल वही नहीं लिखते  जिन् हों ने  प्यार किया या कि प्यार में धोखा पाया। प्रेम की कविता वे भी लिखते हैं जिन् ...
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शनिवार, 10 मार्च 2012

एक रोटी और

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तन्हा बैठा, तो गूंज उठा शोर, अन्तः का। शांति, तुफान के पुर्व की, या कि, तुफानों में घिरे जीवन के मृत्यु का। जो हो, पर अब...
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बुधवार, 7 मार्च 2012

बुरा न मानो होली हे

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अबकी फागून, लालू भैया को नहीं रहो हे भाय। पावर गये तो कुर्ता फाड़ होली, कोय नै खेले आय।। जोगीरा सारा रा रा राबड़ी भौजी भी अब रहने लगी उ...
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Arun sathi
साधारण आदमी। गांव में रहना-सहना। ब्लॉग से पूराना नाता। कुछ भी लिखते रहने की आदत। अपने बारे में बताने को कुछ खास नहीं। बिहार के शेखपुरा जिले के शेरपर गांव निवासी। मीडिया का प्यादा भी। बाकी सब ठीक है। बुरा जो देखन मैं चला, बुरा न मिलया कोय, जो दिल ढूंढा आपना, मुझसा बुरा न कोय...
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